वी.पी. सिंह को केवल मंडल तक सीमित करना उनके साथ अन्याय है

✍️निसार अहमद 

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में थे जिन्होंने सत्ता को लक्ष्य नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। उनका राजनीतिक जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि नेतृत्व में इच्छाशक्ति और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा हो तो सीमित समय में भी इतिहास रचा जा सकता है। दुर्भाग्य से आज उनकी पहचान केवल मंडल आयोग की 27 प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था लागू करने तक सीमित कर दी गई है, जबकि उनके योगदान का दायरा इससे कहीं अधिक व्यापक था।

वी.पी. सिंह ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। यह केवल एक सम्मान नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस महान शिल्पी के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता की अभिव्यक्ति थी, जिनके योगदान की लंबे समय तक उपेक्षा की जाती रही। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक नेल्सन मंडेला को भी भारत रत्न प्रदान कर विश्व स्तर पर सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का संदेश दिया।

(वी.पी. सिंह जी के साथ लेखक निसार अहमद)

संसद के सेंट्रल हॉल में डॉ. आंबेडकर का चित्र स्थापित करते समय वी.पी. सिंह का यह कथन कि “जब दिल में जगह हो, तो दीवार पर भी जगह मिल जाती है।” आज भी सामाजिक न्याय में विश्वास रखने वालों के हृदय को स्पर्श करता है। वर्षों तक यह कहा जाता रहा कि संसद के सेंट्रल हॉल में उपयुक्त स्थान उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनकी सरकार ने सबसे सम्मानजनक स्थान पर डॉ. आंबेडकर का चित्र स्थापित कर इस बहाने को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।
उनकी सरकार ने 12 रबीउल अव्वल (पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाने वाला दिन) तथा कृष्ण जन्माष्टमी पर राष्ट्रीय अवकाश घोषित कर भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत और सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान की भावना को मजबूत किया। यह निर्णय उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच और भारत की विविधता के प्रति सम्मान का प्रतीक था।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनका संघर्ष भी भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। बोफोर्स जैसे मुद्दे पर उन्होंने सत्ता से समझौता करने के बजाय नैतिकता और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी। व्यक्तिगत ईमानदारी, सादगी और सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों के कारण वे अपने राजनीतिक विरोधियों की नजरों में खटक रहे थे।
मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का उनका निर्णय भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर सिद्ध हुआ। इस निर्णय ने पिछड़े वर्गों को शासन और प्रशासन में प्रतिनिधित्व का नया अवसर दिया तथा लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाया। स्वाभाविक रूप से इसका तीखा विरोध भी हुआ, पार्टी के अंदर भी और दल के बाहर भी लेकिन वी.पी. सिंह अपने निर्णय से पीछे नहीं हटे।

सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता उनके लिए केवल राजनीतिक नारे नहीं थे, बल्कि जीवन-मूल्य थे। उन्होंने सत्ता बचाने के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। जब परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि उन्हें अपने मूल्यों और सत्ता में से किसी एक को चुनना था, तो उन्होंने सत्ता का त्याग स्वीकार करते हुए अपनी सरकार को संसद की दहलीज पर कुर्बान कर देना उचित समझा, लेकिन उनके इस ऐतिहासिक फैसले ने बहुत से सेकुलर नेताओं के चाल चरित्र और चेहरों को भी उजागर कर दिया! लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। यही कारण है कि उन्हें सिद्धांतों के लिए सत्ता का बलिदान देने वाले नेताओं में गिना जाता है।

विडंबना यह है कि जिन पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों, सम्मान और राजनीतिक भागीदारी के लिए उन्होंने ऐतिहासिक निर्णय लिए, उन्हीं वर्गों में आज उनके योगदान का स्मरण अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। उनकी जयंती और पुण्यतिथि अक्सर सीमित दायरे में सिमट जाती हैं। किसी भी समाज का नैतिक दायित्व केवल अपने अधिकारों का लाभ उठाना नहीं, बल्कि उन महापुरुषों को भी स्मरण रखना है जिन्होंने उन अधिकारों के लिए संघर्ष की आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह का मूल्यांकन केवल मंडल आयोग तक सीमित न किया जाए। उन्हें सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, लोकतांत्रिक मूल्यों, राजनीतिक ईमानदारी, भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष और संवैधानिक आदर्शों को व्यवहार में उतारने वाले एक दूरदर्शी राजनेता के रूप में याद किया जाए। ऐसे व्यक्तित्वों का सम्मान केवल श्रद्धांजलि देने से नहीं, बल्कि उनके विचारों और मूल्यों को समाज की चेतना में जीवित रखने से होता है। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

निसार अहमद

(लेखक निसार अहमद समाजवादी अध्येता हैं)

 

 

 

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