✍️ कुमार वीरेन्द्र
कांग्रेस पार्टी ने SC-ST विभाग के चेयरमैन राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है। इसके बाद प्रदेश की राजनीति में इस फैसले को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कई राजनीतिक विश्लेषक इसे कांग्रेस की रणनीति के रूप में देख रहे हैं, वहीं कुछ लोग इस फैसले पर सवाल भी उठा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास देखें तो जाटव समाज का बड़ा हिस्सा लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी और मायावती के साथ जुड़ा माना जाता रहा है। यही वजह है कि कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस यदि जाटव वोट बैंक पर विशेष रणनीति बनाती है, तो उसे अपेक्षित सफलता मिलना आसान नहीं होगा। उनका तर्क है कि यह वोट बैंक वर्षों से एक निश्चित राजनीतिक धारा के साथ रहा है और उसमें बड़ी सेंध लगाना किसी भी दल के लिए आसान नहीं है।
इसी आधार पर यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस यदि गैर-जाटव दलित समाज, जैसे कोरी, पासी, कन्नौजिया, और अन्य दलित समुदायों के बीच अपना संगठन मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देती, तो उसके लिए राजनीतिक रूप से अधिक संभावनाएं बन सकती थीं। इन समुदायों में अभी भी राजनीतिक विस्तार की गुंजाइश मानी जाती है।
राजेंद्र पाल गौतम के राजनीतिक सफर को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं। वह पहले आम आदमी पार्टी में रहे, मंत्री भी बने और बाद में विवादों के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी राजनीतिक छवि और कार्यशैली उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के व्यापक विस्तार के लिए पर्याप्त प्रभाव नहीं छोड़ पाएगी।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि प्रदेश प्रभारी केवल संगठनात्मक पद नहीं होता, बल्कि वह पार्टी के सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का चेहरा भी माना जाता है। ऐसे में यदि कांग्रेस किसी ऐसे नेता को यह जिम्मेदारी देती, जिसकी अलग-अलग दलित समुदायों में व्यापक स्वीकार्यता होती, तो पार्टी को संगठन विस्तार में अधिक लाभ मिल सकता था, हालांकि यह भी सच है कि किसी भी राजनीतिक नियुक्ति का वास्तविक असर समय के साथ ही सामने आता है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह फैसला कांग्रेस के लिए लाभदायक साबित होगा या नुकसानदेह। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस निर्णय को लेकर बहस जरूर तेज हो गई है और आने वाले समय में ही यह स्पष्ट होगा कि कांग्रेस की यह रणनीति कितनी सफल रहती है।

