यौम-ए-पैदाइश विशेष: गांधी को जीवन देने वाला नायक बतख मियां, जिसे इतिहास ने भुला दिया

✍️  निसार अहमद

इतिहास केवल उन लोगों का नहीं होता जो सत्ता के शिखर पर पहुँचे, बल्कि उन गुमनाम लोगों का भी होता है जिनके साहस ने इतिहास की दिशा बदल दी। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे अनेक नायक समय की धूल में दब गए। महात्मा गांधी के प्राण बचाने वाले स्वतंत्रता सेनानी बतख मियां अंसारी उन्हीं भूले-बिसरे नायकों में से एक हैं, जिनका योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज होना चाहिए था।

26 जून 1869 को बिहार के पश्चिम चंपारण ज़िले के सिसवा अजगरी गाँव में जन्मे बतख मियां अंसारी एक साधारण परिवार से थे। उनके पास न कोई राजनीतिक पद था, न संपत्ति और न ही प्रसिद्धि। लेकिन 1917 में उन्होंने ऐसा साहसिक निर्णय लिया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वह चंपारण सत्याग्रह का दौर था। महात्मा गांधी नील की खेती के नाम पर किसानों पर हो रहे अंग्रेज़ी अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। गांधी की बढ़ती लोकप्रियता और जनसमर्थन से अंग्रेज़ नीलहे घबरा गए। उन्होंने गांधी की हत्या की साज़िश रची। योजना थी कि भोजन या दूध में धीमा ज़हर मिलाकर उनकी हत्या कर दी जाए, ताकि किसी को तत्काल संदेह भी न हो।

इस षड्यंत्र को अंजाम देने की जिम्मेदारी अंग्रेज़ नील फैक्ट्री के घरेलू नौकर बतख मियां अंसारी को सौंपी गई। एक तरफ मालिक का आदेश था, दूसरी तरफ एक निर्दोष इंसान की जान। नौकरी बचाने और ज़मीर बचाने के बीच खड़े बतख मियां ने इंसानियत का रास्ता चुना।

जब वे ज़हर मिला दूध लेकर गांधी के सामने पहुँचे, तो उनके हाथ काँप उठे। गांधी ने उनकी घबराहट देखी और कारण पूछा। बतख मियां की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने पूरी साज़िश का खुलासा कर दिया। एक गरीब नौकर का यह नैतिक साहस केवल गांधी के प्राण बचाने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की एक निर्णायक धारा को भी सुरक्षित रखा।

इस साहस की कीमत उन्हें पूरी जिंदगी चुकानी पड़ी। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें जेल में डाल दिया, उनका घर उजाड़ दिया, ज़मीन छीन ली गई और परिवार को तरह-तरह की यातनाएँ दी गईं। बताया जाता है कि उन्होंने लगभग 17 वर्ष जेल में बिताए, लेकिन अपने निर्णय पर कभी पछतावा नहीं किया।

स्वतंत्रता के बाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से उनके योगदान को स्वीकार किया। मोतिहारी की एक सभा में उन्होंने बतख मियां अंसारी को मंच पर बुलाकर गले लगाया और कहा कि इसी व्यक्ति ने चंपारण में महात्मा गांधी के प्राण बचाए थे। उनके परिवार के पुनर्वास के लिए भूमि देने का निर्देश भी दिया गया, किंतु यह निर्णय कागज़ों से आगे नहीं बढ़ सका।

4 दिसंबर 1957 को बतख मियां अंसारी का निधन हो गया, लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी कुर्बानी को वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी।

बतख मियाँ के वंशजो का घर

आज उनका परिवार आर्थिक तंगी और अभाव में जीवन गुजार रहा है। यह केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि राष्ट्र की ऐतिहासिक स्मृति की परीक्षा भी है। जिस व्यक्ति ने अपने स्वार्थ, नौकरी और जीवन की परवाह किए बिना राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा, उसके अपने आज भी सम्मान और अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

बतख मियां अंसारी का यौम-ए-पैदाइश केवल एक स्वतंत्रता सेनानी को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का भी दिन है कि क्या हमने अपने गुमनाम नायकों के साथ न्याय किया है। राष्ट्र की मजबूती केवल स्मारकों और समारोहों से नहीं होती, बल्कि उन अनाम वीरों के सम्मान से होती है, जिनके त्याग ने आज़ादी की नींव रखी।

बतख मियां अंसारी का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि सत्य, नैतिक साहस और इंसानियत के प्रतीक के रूप में दर्ज होना चाहिए। यही उनके यौम-ए-पैदाइश पर सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

निसार अहमद   

(समाजवादी अध्येता)

 

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