सामाजिक न्याय के सबसे बड़े जननायकों में एक : लालू प्रसाद

✍️ लालटून यादव

भारतीय लोकतंत्र में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका मूल्यांकन केवल चुनावी जीत-हार या सत्ता के वर्षों से नहीं किया जा सकता। उनका महत्व इस बात से तय होता है कि उन्होंने समाज के किन वर्गों को आवाज़ दी, किन लोगों को सम्मान दिलाया और राजनीति की दिशा को किस हद तक बदला। बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव ऐसा ही एक नाम हैं। उनके जन्मदिन के अवसर पर उनके राजनीतिक जीवन, सामाजिक न्याय की अवधारणा और लोकतांत्रिक योगदान को याद करना केवल एक व्यक्ति को शुभकामना देना नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिवर्तन की यात्रा को स्मरण करना है जिसने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी।लालू प्रसाद यादव का उदय ऐसे समय में हुआ जब बिहार सहित पूरे उत्तर भारत की राजनीति पर परंपरागत प्रभुत्वशाली वर्गों का प्रभाव था। राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा के अधिकांश केंद्र समाज के सीमित तबकों के हाथों में केंद्रित थे। पिछड़े, अतिपिछड़े, दलित और वंचित समुदाय राजनीतिक रूप से मौजूद तो थे, लेकिन निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनकी भागीदारी बेहद सीमित थी। ऐसे दौर में समाजवादी आंदोलन और मंडल राजनीति की पृष्ठभूमि से निकले लालू प्रसाद यादव ने राजनीति को एक नया सामाजिक आधार प्रदान किया।उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि यह रही कि उन्होंने लोकतंत्र को केवल मतदान तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक सम्मान और भागीदारी के प्रश्न से जोड़ा। लालू प्रसाद बार-बार कहते रहे कि सत्ता केवल शासन चलाने का माध्यम नहीं, बल्कि उन लोगों को अधिकार देने का उपकरण है जिन्हें सदियों तक हाशिये पर रखा गया। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में बिहार की राजनीति में पिछड़े वर्गों, दलितों, अल्पसंख्यकों और गरीब तबकों की आवाज़ पहले की तुलना में कहीं अधिक मुखर हुई।1990 के दशक में जब वे बिहार के मुख्यमंत्री बने, तब सामाजिक न्याय की राजनीति अपने निर्णायक चरण में थी। मंडल आयोग की सिफारिशों को लेकर पूरे देश में बहस चल रही थी। ऐसे समय में लालू प्रसाद ने पिछड़े वर्गों के आरक्षण और प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाया। उन्होंने सामाजिक न्याय को केवल नारे के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडे के रूप में स्थापित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि बिहार के गांवों और कस्बों में रहने वाले लाखों लोगों को पहली बार यह एहसास हुआ कि सत्ता और प्रशासन पर उनका भी अधिकार है।लालू प्रसाद की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष सांप्रदायिक सद्भाव की रक्षा भी रहा है। 1990 के दशक में जब देश के अनेक हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा था, तब बिहार अपेक्षाकृत शांत रहा। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को अपनी राजनीति का केंद्रीय तत्व बनाए रखा। यही कारण है कि सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता उनके राजनीतिक विमर्श के दो प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं।उनकी राजनीति का सबसे बड़ा प्रभाव मनोवैज्ञानिक स्तर पर दिखाई देता है। जिन समुदायों के लोग पहले सार्वजनिक मंचों पर बोलने में संकोच करते थे, वे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आए। पंचायतों, स्थानीय निकायों और विभिन्न सार्वजनिक संस्थाओं में वंचित तबकों की भागीदारी बढ़ी। सामाजिक हैसियत और आत्मविश्वास में आए इस बदलाव को अनेक सामाजिक वैज्ञानिक भारतीय लोकतंत्र के महत्वपूर्ण परिवर्तनों में गिनते हैं।निश्चित रूप से लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक जीवन विवादों और आलोचनाओं से भी अछूता नहीं रहा। उनके शासनकाल को लेकर विकास, प्रशासनिक दक्षता और कानून-व्यवस्था के प्रश्न उठाए जाते रहे हैं। लोकतंत्र में किसी भी बड़े नेता की तरह उनके कार्यकाल का मूल्यांकन भी विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जाता है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि सामाजिक न्याय की राजनीति को जन-आंदोलन का स्वरूप देने और सत्ता संरचनाओं में वंचित समुदायों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।आज बिहार और देश की राजनीति में सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व, आरक्षण, भागीदारी और सामाजिक समानता जैसे मुद्दे जिस व्यापकता के साथ चर्चा में हैं, उसमें लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक संघर्षों का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने यह स्थापित किया कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं का ढाँचा नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति को सम्मान और अवसर दिलाने की प्रक्रिया भी है।उनके समर्थकों के लिए लालू प्रसाद केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक हैं। वे उस दौर की याद दिलाते हैं जब राजनीति में वंचित समाज की आवाज़ को संगठित शक्ति मिली। उनके विरोधी भले ही उनकी नीतियों और शैली से असहमत हों, लेकिन भारतीय राजनीति में उनके प्रभाव और सामाजिक न्याय के विमर्श को नई ऊँचाई देने में उनकी भूमिका को स्वीकार करना पड़ता है।उनके जन्मदिन पर यह कहना उचित होगा कि किसी भी नेता की सबसे बड़ी विरासत उसके द्वारा छोड़े गए विचार और सामाजिक परिवर्तन होते हैं। लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत भी इसी कसौटी पर महत्वपूर्ण है। उन्होंने समाज के उन वर्गों को आत्मविश्वास दिया जो लंबे समय तक सत्ता और प्रतिष्ठा के केंद्रों से दूर रहे। सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक भागीदारी के जिन मूल्यों को उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन का आधार बनाया, वे आज भी भारतीय लोकतंत्र के लिए प्रासंगिक हैं।
जन्मदिन के इस अवसर पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ। उनकी राजनीतिक यात्रा भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय की उस सतत धारा की याद दिलाती है, जिसने लाखों लोगों को अधिकार, सम्मान और प्रतिनिधित्व का नया विश्वास दिया। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे स्थायी राजनीतिक विरासत है।

 लालटून यादव

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