पंत छात्रावास पर संकट: दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक छात्रों के सपनों पर फिर मंडराया खतरा

सवाल सिर्फ रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय का नहीं है, बल्कि उन तमाम शैक्षणिक संस्थानों का है जो दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों की शिक्षा और सामाजिक उन्नति का आधार रहे हैं। इसी कड़ी में अब सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार की योजना के तहत संचालित प्रयागराज का पंत छात्रावास (आईएएस प्रशिक्षण संस्थान) भी गंभीर संकट से जूझ रहा है।

यह छात्रावास वर्षों तक आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाशाली छात्रों को निःशुल्क आवास और सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी का अवसर देता रहा। वर्ष 2004 में तत्कालीन केंद्र सरकार के दौरान इसकी अनुदान राशि बंद कर दी गई। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अधीन यह छात्रावास छात्रों से लिए जाने वाले शुल्क के आधार पर संचालित होने लगा

कोरोना महामारी के दौरान छात्रावास बंद कर दिया गया था, लेकिन छात्रों के निरंतर प्रयास और संघर्ष से इसे दोबारा शुरू कराया गया। अब एक बार फिर इसके अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है।

19 जुलाई 2026 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रावास खाली कराने का प्रयास किया। छात्रों के तीव्र विरोध के चलते यह प्रयास सफल नहीं हो सका। आरोप है कि इसके बाद छात्रावास की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई। पिछले 24 घंटे से छात्र बिना बिजली और पानी के छात्रावास में डटे हुए हैं और अपने संस्थान को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। छात्रों ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन के अधिकारी अपने स्वर्णवादी नजरिए से अंतर्वासियो को देखते हैं।

छात्रों का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन वास्तव में छात्रावास खाली कराना चाहता है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि आगे इसकी क्या योजना है। अब तक न तो नए प्रवेश की कोई अधिसूचना जारी की गई है, न ही छात्रावास के संचालन को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना सामने आई है। ऐसे में छात्रों को आशंका है कि छात्रावास को बंद कर अव्यवस्था के हवाले छोड़ दिया जाएगा, जिससे भविष्य में उसके मूल उद्देश्य और स्वरूप पर ही प्रश्नचिह्न लग जाएगा।

पंत छात्रावास केवल एक भवन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समान अवसर की उस परंपरा का प्रतीक है, जिसने अनेक वंचित वर्गों के युवाओं को प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंचने का अवसर दिया। इसलिए यह विवाद केवल एक छात्रावास का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की उस व्यवस्था का भी है, जिस पर हजारों छात्रों का भविष्य टिका हुआ है।

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