मोहम्मद अली गौहर विश्वविद्यालय: बुल्डोजर V/S कानून

रामपुर मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय पर योगी आदित्यनाथ के बुलडोजर की कार्यवाही क्या कानून का राज है या राजनीतिक प्रतिशोध है, राहत इंदौरी के इन पंक्तियों से समझिये:-

“लश्कर भी तुम्हारा है, सरदार तुम्हारा है,

तुम झूठ को सच लिख दो, अख़बार तुम्हारा है।

इस दौर के फ़रियादी जाएँ तो कहाँ जाएँ,

कानून तुम्हारा है, दरबार तुम्हारा है।”

रामपुर में मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय का विवाद सुर्खियों में है यह मामला अब केवल नक्शा, निर्माण या प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इस लोकतान्त्रिक देश के शासनसत्ता, न्याय और राजनीतिक निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

BJP और RSS के योगी सरकार में 2017 से ही बुरे दिनों की शुरुआत हो गयी थी शुरुआत में विश्वविद्यालय के कुछ पाठ्यक्रमों की मान्यताओं को प्रभावित कर और यूनिवर्सिटी के बजट को रोकर, अन्य जाँच के नाम पर निर्माणधीन कार्यों व शिक्षण कार्यों को प्रभावित किया गया, IAS आंजनेय कुमार सिंह 2019 से 2021 तक जिलाधिकारी रामपुर बने रहे उनके कार्यकाल में आज़म खान पर मुकदमों की बाढ़ आ गयी उनकी पत्नी डॉ. तंजीन फ़ातिमा और बेटे अब्दुल्ला आज़म पर मुकदमों के साथ आजम खान पर किताब चोरी से लेकर बकरी चोरी तक सैकड़ों फर्जी मुकदमे दर्ज किये गये आजम खान को भू-माफिया घोषित किया गया। आज़म खान ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान आरोप लगाया था कि उनके खिलाफ योगी आदित्यनाथ सरकार के इशारे पर दमनात्मक कार्रवाई की जा रही है।

आज वही IAS आंजनेय कुमार सिंह रामपुर मंडल के कमिश्नर हैं, रामपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष होने के साथ-साथ वे अपीलीय अधिकारी भी हैं दूसरी ओर, रामपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष एवं जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी ने 15 जुलाई को मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की 38 इमारतों को बिना मानचित्र स्वीकृति के निर्मित बताते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश दिया है।

मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय पर बुलडोजर चलने के खिलाफ उठ रही आवाज कमिश्नर आंजनेय कुमार सिंह के साथ ही साथ देश के लोकतान्त्रिक मूल्यों व खोखले हो रहे न्यायिक व्यवस्था पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहा है, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BJP अपने मातृ संगठन RSS के जरिये देश के सभी लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर कब्जा कर रखा है, इस देश के सारे फैसले अब नागपुर संघ कार्यालय से लिखें जा रहे हैं देश की प्रमुख न्यायपालिका के आस्था के आधार पर दिए गये राममंदिर के निर्णय को दुनिया ने देखा है, यहीं से न्याय पर यह प्रश्न और गहरा हो जाता है कि क्या निर्णय लेने वाला अधिकारी व न्यायाधीश निष्पक्षता से न्याय की बात करेगा या सिर्फ पहले से तय फैसले को कानूनी जामा पहनाएगा ऐसे समय में आमिर अज़ीज़ की प्रतिरोध कविता की पंक्तियाँ याद आती हैं:-

“तुम स्याही से झूठ लिखोगे,

हम ख़ून से सच लिखेंगे।

तुम अदालत से बैठ के फ़ैसला सुनाओगे,

हम दीवारों पर ‘इंक़लाब’ लिखेंगे।”

मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की 38 इमारतों पर बुलडोजर चलाने का आदेश केवल भवन निर्माण नियमों का प्रश्न नहीं, बल्कि मुस्लिमों के लिए एक उन्हें दोयम दर्जे का बना देने का एक राजनीतिक संदेश है, यदी पूरे देश में बिना स्वीकृत मानचित्र वाले निर्माणों पर समान कार्रवाई हो तो यह देश खंडर में तब्दील हो जाऐगा। लेकिन केवल चुनिंदा इमारतों को जाति और धर्म के चश्मे से देखकर बुलडोजर से जमीदोज किया जायेगा, तो निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

देश और दुनिया में जाति और से ऊपर उठकर इंसाफ और न्याय पसंद लोग इस ‘बुलेट और बुलडोजर’ की सरकार पर नज़र लगाए हुए है कि अपीलीय अधिकारी के रूप में कमिश्नर आंजनेय कुमार सिंह और इस देश की न्यायपालिका इस मामले में क्या निर्णय देती हैं। यह निर्णय केवल 38 इमारतों का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि इस देश में लोकतान्त्रिक मूल्यों का क्या भविष्य होगा!

 

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