कला और संस्कृति की भाषा भी समझते हैं लालू

✍️ डॉ. लाल रत्नाकर

लालू जी को जैसा मैंने देखा और जितना जाना व समझा, उसका कारण भिन्न-भिन्न हो सकता है, लेकिन लालू जी की वजह से समाज का जो तत्कालीन विभाजन था, वह साफ तौर दिखाई देता था कि सामाजिक अन्याय करने वाले लोग कौन हैं और उन लोगों का वर्चस्व कैसे टूट रहा था और सामाजिक न्याय पर बात करने वालों का मनोबल कैसे बढ़ रहा था। उसके प्रतीक के रूप में तत्कालीन समाज यह महसूस करने लगा था कि इसके असली चेहरा कौन है। यह वही समय था, जब देश में सामाजिक न्याय पसंद करने वाले नेताओं का उभार हो रहा था। उत्तर भारत में खास तौर पर चौधरी चरण सिंह के बाद एक उम्मीद जगी थी, जिसमें आगे चलकर विपक्ष के नेताओं में खास करके शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव के साथ ही राम विलास पासवान आदि का उभार हो रहा था। इस दौर में लोगों में आत्म विश्वास मजबूत होने लगा था कि अब देश में न्याय और संविधान की बात होगी और अब हमारे अधिकार हमें मिलेंगे। व्यक्तिगत तौर पर तब मैं विद्यार्थी था, जब इस तरह के परिवर्तन की आंध ती चल रही थी।

 

गोरखपुर विश्वविद्यालय की एक घटना याद आती है, जो सत्तर के दशक की है। जब जेपी मूवमेंट अपने चरम पर था और उस समय गोरखपुर विश्वविद्यालय में छात्र संघ के चुनाव हो रहे थे। इसमें विश्वकर्मा द्विवेदी चुनाव लड़ रहे थे और उन्हें जनता दल का समर्थन था। उनके साथ वहां के जाने-माने नेता रवींद्र सिंह उनका चुनाव प्रचार देख रहे थे। रवींद्र सिंह से मेरी मुलाकात मेरी कला के मध्यम से होती रहती थी। इसलिए जब लालू प्रसाद, जिन्हें तब एल पी यादव कहा जाता था. चुनाव प्रचार के लिए गोरखपुर आए और रविन्द्र सिंह ने उनसे मुझे भी मिलवाया कि यह बहुत अच्छे कलाकार है।

बात आई गई हो गई। मैं अपने सब्जेक्ट के अध्यापन के लिए अमेठी से अपनी यात्रा शुरू करके दिल्ली के करीब गाजियाबाद के सबसे बड़े कॉलेज में पहुंचा। स्वाभाविक था कि मुझे अपनी कला को विकसित करना था। इसके लिए प्रदर्शनियों आयोजन महत्वपूर्ण गैलरियों में करता रहा। इसी क्रम में मेरे चित्रों की एक एकल प्रदर्शनी कलकत्ता की मशहूर गैलरी बिरला अकादमी आफ आर्ट एण्ड कल्चर में प्रदर्शनी करने का अवसर मिला। लालू जी से मेरी मुलाकात हुई, जब मुझे कलकत्ता की बिरला आर्ट गैलरी में अपने चित्रों के प्रदर्शन के लिए मौका मिला था। मुझे लगा कि अगर मेरे इन चित्रों की प्रदर्शनी, जिसमें गाय और भैंसों की संख्या ज्यादा है, का उ‌द्घाटन लालू प्रसाद करें तो बहुत अच्छा रहेगा। अब लालू प्रसाद तक पहुंच के लिए रास्ते की तलाश थी। इस संबंध में विख्यात फोटोग्राफर जगदीश यादव से विमर्श किया। उन्होंने मिलाने की व्यवस्था की। उन दिनों बिहार भवन में लालू जी आए हुए थे। मैं अपने कुछ ब्रोशर लेकर लालू जी से मिलने बिहार भवन गया। जब जगदीश यादव के साथ लालू जी से मिला तब अपने ब्रोशर उनको दिए। उन्होंने उलट-पलट कर के देखा और कहा कि यह चित्र तो समझ में आते हैं। ये तो गांव देश और आम आदमी के चित्र है। जब उनके सामने यह प्रस्ताव रखा गया कि इन्हीं चित्रों की एक प्रदर्शनी कोलकाता की मशहूर गैलरी में हो रही जिसमें आपको मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने आया हूं। उन्होंने कहा कि बिल्कुल मैं आऊंगा। वहीं शिवानंद तिवारी भी बैठे थे। उन्हें भी आमंत्रित किया।

कुछ ऐसी आकस्मिकता हुई होगी, जिसकी वजह से लालू प्रसाद कलकत्ता नहीं आ पाए, लेकिन उनके नाम का मेरा निमंत्रण पत्र सभी अखबारों के कलाप्रेमियों को भेजा गया था। 11 सितम्बर, 2001 की वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टॉवर पर हमले की एक ऐसी घटना घटी, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया था। अमेरिका के उस टावर पर उसी दिन हमला हुआ, जिस दिन मेरी प्रदर्शनी का उ‌द्घाटन था। 11 सितम्बर, 2001 और मेरे भीतर एक निराश भर गई कि अब मेरी प्रदर्शनी का क्या होगा। लेकिन इस प्रदर्शनी के उ‌द्घाटन के लिए शिवानंद तिवारी कलकत्ता आए। परन्तु अखबारों ने यह सवाल किया कि लालू जी को आना था। फिर तिवारी जी ने जो कारण बताए वह हमारे लिए संतोषप्रद था कि वह अपनी व्यस्तता की वजह से इस आयोजन में शरीक नहीं हो पा रहे हैं। लेकिन उसका लाभ यह कि जब उ‌द्घाटन के दूसरे दिन अखबारों में खबर छपी तो मेरी प्रदर्शनी का जिक्र लगभग हर महत्वपूर्ण अखबारों में हुआ।

कुछ पत्रकारों ने मुझसे यह पूंछा कि आपने इस प्रदर्शनी के उद्घाटन के लिए लालू प्रसाद यादव का ही चयन क्यों किया तो मैंने उन्हें जो जवाब दिया था कि मेरे चित्रों को जो सम्मान दे सकता है, वह इस समय के राजनेताओं में लालू प्रसाद के अलावा दूसरा कोई नजर नहीं आता। इसलिए मैंने उनको इस प्रदर्शनी के उद्घाटन लिए बुलाया था। यह अलग बात है कि वे किसी कारण से नहीं पहुंच पाए।

समय बीतता गया। मैं राजनीति में भी लगा रहा और एक समय आया कि जब शरद यादव जी ने लोकतांत्रिक जनता दल के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी थी। राष्ट्रीय जनता दल के साथ जब विलय कर दिया और उसमें मुझे राष्ट्रीय सचिव के रूप में काम करने का मौका मिला। हमने अनुभव किया कि लालू जी भारत के असली समाज विज्ञानी है, कला संस्कृति प्रेमी हैं एवं राजनीतिज्ञ हैं, जो इस देश की राजनीतिक तिलिस्म को समझते हैं।

-✍️ डॉ. लाल रत्नाकर, विश्वप्रसिद्ध चित्रकार हैं, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान कर रहे हैं।(संस्मरण)

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