निसार अहमद ✍️
लखनऊ के गोमती नगर में स्थित जय प्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर यानी JPNIC आज जिस बहस के केंद्र में है, वह केवल एक सरकारी भवन की लीज का सवाल नहीं है। इसके साथ समाजवादी विचार, लोकनायक जयप्रकाश नारायण का लंबा संघर्ष और आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास को सुरक्षित रखने का उद्देश्य जुड़ा हुआ है।
JPNIC का निर्माण समाजवादी पार्टी की सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में हुआ और 11 अक्टूबर 2016 को इसका उद्घाटन किया गया। इसकी शुरुआती अनुमानित लागत करीब 265.58 करोड़ रुपये थी, जो आगे बढ़ती गई और परियोजना पर लगभग 800 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने की बात सामने आई। यानी यह जनता के धन से तैयार की गई एक बड़ी सार्वजनिक परियोजना है।
इस केंद्र की परिकल्पना केवल एक भवन खड़ा करने की नहीं थी। यहां संग्रहालय, सांस्कृतिक गतिविधियां, कन्वेंशन सेंटर, खेल और सार्वजनिक उपयोग की सुविधाओं के साथ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जीवन, संघर्ष और विचारों से जुड़ी सामग्री को सुरक्षित रखने की सोच थी। उनके जीवन से जुड़े दस्तावेज, पुस्तकें, पत्र, पांडुलिपियां, तस्वीरें, भाषण और अन्य रिकॉर्ड एक जगह सुरक्षित रहें, ताकि आम जनता इतिहास से परिचित हो और इतिहास, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र, पत्रकारिता तथा समाजवादी आंदोलन पर शोध करने वाले विद्यार्थियों और शोधार्थियों को प्रमाणिक सामग्री उपलब्ध हो सके।
और जिस व्यक्तित्व के नाम पर यह केंद्र बना है, लोकनायक जयप्रकाश नारायण कोई मामूली राजनीतिक हस्ती नहीं थे। उनका जीवन आजादी से पहले के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आजादी के बाद के सामाजिक और लोकतांत्रिक जनांदोलनों तक फैला हुआ था।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण को हजारीबाग जेल में बंद किया गया था। लेकिन जेल की चारदीवारी उनके संकल्प को रोक नहीं सकी। वे साथियों के साथ हजारीबाग जेल से निकलने में सफल हुए और भूमिगत आंदोलन में सक्रिय हो गए। इसके बाद उन्होंने नेपाल पहुंचकर ‘आजाद दस्ता’ के गठन में भूमिका निभाई, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध को संगठित करना था। इस दौर ने जयप्रकाश नारायण को केवल समाजवादी नेता ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संघर्ष के एक साहसी सेनानी के रूप में भी स्वयं को स्थापित किया।
आजादी के बाद भी उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने सत्ता की राजनीति को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं माना। सामाजिक परिवर्तन, भूदान-सर्वोदय और जनभागीदारी के सवालों से जुड़े और समाज को नीचे से बदलने की कोशिश करते रहे।
फिर 1970 का दशक आया। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और व्यवस्था के खिलाफ छात्रों और युवाओं के बीच उठ रही आवाज को जयप्रकाश नारायण ने व्यापक दिशा दी। उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। यह आंदोलन केवल सरकार बदलने की मांग तक सीमित नहीं था, बल्कि राजनीति, समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन की पुकार बन गया।
और इसके बाद आया 25 जून 1975 का आपातकाल, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह दौर जिसे भुलाया नहीं जा सकता। आपातकाल लागू होने के बाद विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं और नागरिक स्वतंत्रताओं पर गंभीर प्रतिबंध लगाए गए। जयप्रकाश नारायण भी गिरफ्तार किए गए। उस दौर में उनका संघर्ष लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा से जुड़ गया। आपातकाल के विरोध में उनकी आवाज भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बनी।
इसलिए जयप्रकाश नारायण का नाम किसी एक राजनीतिक दौर या किसी एक आंदोलन तक सीमित नहीं है। उनके जीवन में आजादी की लड़ाई है, हजारीबाग जेल से पलायन है, नेपाल में आजाद दस्ते का संगठन है, समाजवादी आंदोलन है, भूदान-सर्वोदय है, संपूर्ण क्रांति है और आपातकाल के खिलाफ लोकतंत्र की लड़ाई भी है।
यही वह इतिहास है जिसे JPNIC जैसे केंद्र में सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की जरूरत थी।
अब जब JPNIC को 30 साल की लीज पर निजी कंसोर्टियम को देने का फैसला किया गया है, तो सवाल सीधा है कि जिस उद्देश्य को लेकर यह केंद्र बनाया गया था, उसका क्या होगा?
क्या जयप्रकाश नारायण से जुड़े दस्तावेज, पुस्तकें, पत्र और पांडुलिपियां सुरक्षित रहेंगी? क्या उनके जीवन और आंदोलनों का व्यवस्थित अभिलेखागार तैयार होगा? क्या शोधार्थियों और विद्यार्थियों को इन मूल स्रोतों तक पहुंच मिलेगी? क्या संग्रहालय केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा या वास्तव में लोकनायक के जीवन और विचारों को समझने का केंद्र बनेगा?
यहां सवाल किसी एक भवन की दीवारों का नहीं है। सवाल इतिहास को बचाने का है।
किसी शोधार्थी के लिए जयप्रकाश नारायण का कोई पुराना पत्र, भाषण, पांडुलिपि, आंदोलन से जुड़ा दस्तावेज या दुर्लभ तस्वीर केवल पुरानी सामग्री नहीं होती; वह इतिहास का प्रमाण और शोध का मूल स्रोत होती है। इसलिए JPNIC में ऐसी सामग्री का संरक्षण और सार्वजनिक पहुंच अपने आप में एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
हमारा सवाल इसी जगह से उठता है कि JPNIC का निजी संचालन हो सकता है या नहीं, इस बहस से पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि उसके मूल सार्वजनिक और ऐतिहासिक उद्देश्य के साथ कोई समझौता न हो।
JPNIC वर्षों तक उपयोग में नहीं आ सका। जनता के धन से बनी इस संपत्ति का इतने लंबे समय तक सक्रिय न हो पाना भी सवाल खड़ा करता है। लेकिन अब जब इसे सक्रिय करने की बात हो रही है तो प्राथमिकता केवल भवन के संचालन की नहीं, बल्कि उस उद्देश्य को जीवित रखने की होनी चाहिए जिसके लिए इसकी कल्पना की गई थी।
JPNIC को ऐसा केंद्र बनाया जाना चाहिए जहां लोकनायक जयप्रकाश नारायण का इतिहास केवल तस्वीरों में नहीं, बल्कि दस्तावेजों, पुस्तकों, पत्रों, पांडुलिपियों और अभिलेखों में जीवित मिले; जहां लोग केवल घूमने न आएं, बल्कि पढ़ें; जहां शोधार्थी केवल भवन न देखें, बल्कि इतिहास के मूल स्रोतों तक पहुंच सकें; जहां नई पीढ़ी यह समझ सके कि आजादी की लड़ाई से लेकर लोकतंत्र की रक्षा तक जयप्रकाश नारायण का संघर्ष कितना व्यापक था।
क्योंकि लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विरासत किसी एक दल की संपत्ति नहीं, भारतीय लोकतंत्र की सार्वजनिक विरासत है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि JPNIC किसके पास रहेगा। असली सवाल यह है कि JPNIC किस उद्देश्य के लिए जिएगा।
इमारत बची रह सकती है, जमीन सरकारी रह सकती है और मालिकाना हक LDA के पास भी रह सकता है, लेकिन यदि उसके मूल सार्वजनिक, ऐतिहासिक और वैचारिक उद्देश्य को व्यावसायिक प्राथमिकताएं पीछे छोड़ दें तो सवाल उठेगा ही कि क्या हमने विरासत की इमारत तो बचा ली, लेकिन उसकी आत्मा मझधार में छोड़ दी?
JPNIC की सार्थकता उसकी ऊंची इमारत में नहीं, बल्कि उस इतिहास में है जिसे वह आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा सकता है।
हजारीबाग की जेल से निकलकर नेपाल में आजाद दस्ते को संगठित करने वाले जयप्रकाश नारायण से लेकर संपूर्ण क्रांति का आह्वान करने वाले लोकनायक और आपातकाल के अंधेरे में लोकतंत्र की आवाज बने जयप्रकाश तक—उनकी पूरी यात्रा JPNIC में सुरक्षित और जीवित रहनी चाहिए।
यही इस केंद्र की वास्तविक पहचान है। यही उसकी विरासत है। और यही वह उद्देश्य है जिसे किसी भी कीमत पर मझधार में नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

लेखक निसार अहमद समाजवादी जनचिंतक हैं।
