7अगस्त : मंडल दिवस — सामाजिक न्याय की यात्रा और भारतीय लोकतंत्र का विस्तार

✍️  निसार अहमद

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं, जो केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं होतीं, बल्कि राष्ट्र के सामाजिक और राजनीतिक विकास की दिशा बदलने वाले ऐतिहासिक पड़ाव बन जाती हैं। 7 अगस्त ऐसी ही एक ऐतिहासिक तिथि है। वर्ष 1990 में इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने संसद में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की। यह निर्णय केवल केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने तक सीमित नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय, समान अवसर और प्रतिनिधित्व के एक नए युग का उद्घोष था।

इस घोषणा ने सदियों से सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित रहे करोड़ों लोगों में यह विश्वास जगाया कि लोकतंत्र केवल मतदान का अधिकार नहीं, बल्कि सत्ता, प्रशासन, शिक्षा और व्यवस्था में समान भागीदारी का भी नाम है।

मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए वी. पी. सिंह ने जिस राजनीतिक साहस का परिचय दिया, वह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्हें मालूम था कि यह फैसला राजनीतिक रूप से आसान नहीं होगा। उन्हें तीव्र विरोध, राजनीतिक अस्थिरता और अपनी सरकार पर संकट का सामना करना पड़ेगा। फिर भी उन्होंने सामाजिक न्याय के प्रश्न पर पीछे हटने के बजाय सत्ता की कीमत चुकाना स्वीकार किया।

वी. पी. सिंह ने सरकार बचाने से ज्यादा सामाजिक न्याय के अपने निर्णय को बचाना जरूरी समझा। उन्होंने सत्ता से समझौता करके अपने निर्णय को कमजोर करने के बजाय अपनी सरकार का बलिदान स्वीकार किया, लेकिन मंडल के प्रश्न पर झुकना स्वीकार नहीं किया। इतिहास में नेताओं का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि उन्होंने कितने दिन सत्ता चलाई, बल्कि इस आधार पर भी होता है कि उन्होंने सत्ता में रहते हुए कौन-से ऐतिहासिक निर्णय लिए और उन निर्णयों के लिए कितनी राजनीतिक कीमत चुकाई। इस कसौटी पर मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का वी. पी. सिंह का निर्णय भारतीय सामाजिक न्याय की यात्रा का एक निर्णायक अध्याय है।

मंडल दिवस केवल एक सरकारी निर्णय का स्मरण नहीं है। यह उस वैचारिक और सामाजिक संघर्ष का प्रतीक है जिसकी जड़ें भारत के लंबे इतिहास में दिखाई देती हैं।

गौतम बुद्ध ने जन्म के आधार पर मनुष्य की श्रेष्ठता को अस्वीकार करते हुए समानता और करुणा का संदेश दिया। संत कबीर ने जाति और ऊँच-नीच पर प्रहार करते हुए मनुष्य की पहचान उसके कर्म से करने की बात कही। आधुनिक भारत में महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम बनाया। छत्रपति शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर रियासत में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू कर यह सिद्ध किया कि सामाजिक न्याय केवल विचार नहीं, बल्कि नीति का विषय भी है। दक्षिण भारत में पेरियार ई. वी. रामासामी ने आत्मसम्मान आंदोलन के माध्यम से सामाजिक बराबरी की चेतना को जन-जन तक पहुँचाया।

इन वैचारिक धाराओं को संवैधानिक आधार देने का महान कार्य डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने किया। उन्होंने भारतीय संविधान में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को राष्ट्र की आधारशिला बनाया। उनके लिए लोकतंत्र का अर्थ केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना में समान भागीदारी सुनिश्चित करना था।

स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति को नई वैचारिक शक्ति देने का श्रेय डॉ. राममनोहर लोहिया को जाता है। उनका प्रसिद्ध नारा—“पिछड़ा पावे सौ में साठ”—भारतीय राजनीति में प्रतिनिधित्व की नई बहस का आधार बना।

जननायक कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू कर इस विचार को व्यवहार में उतारा। उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी सरकार के दौरान मुख्यमंत्री रामनरेश यादव ने पिछड़े वर्गों के अधिकारों और प्रतिनिधित्व के प्रश्न को शासन की प्राथमिकताओं में स्थान देने की महत्वपूर्ण पहल की, जिसने सामाजिक न्याय के विमर्श को संस्थागत आधार प्रदान किया।

चौधरी चरण सिंह ने किसानों, ग्रामीण भारत और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक चेतना को राष्ट्रीय स्वर दिया, जबकि देवी लाल ने उत्तर भारत में किसानों और वंचित तबकों के सशक्तिकरण को नई गति दी। इन्हीं वैचारिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रयासों ने आगे चलकर मंडल आयोग की आवश्यकता को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।

वर्ष 1979 में जनता पार्टी सरकार ने बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल (बी. पी. मंडल) की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया। आयोग ने व्यापक अध्ययन के बाद अपनी रिपोर्ट में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण सहित अनेक महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं। लगभग एक दशक तक यह रिपोर्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में लागू नहीं हो सकी। अंततः 7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इसे लागू करने की घोषणा कर भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय को निर्णायक स्थान दिलाया।

मंडल की घोषणा के बाद देश में तीव्र बहस छिड़ी। अनेक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए, वहीं वंचित समाज ने इसे अपने सम्मान और अधिकार की ऐतिहासिक जीत के रूप में देखा। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामले में OBC आरक्षण को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया और सामाजिक न्याय के सिद्धांत को न्यायिक मान्यता प्रदान की।

वर्ष 2006 में सामाजिक न्याय की इस यात्रा को एक नई दिशा मिली। तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस निर्णय ने मंडल आयोग की भावना को सरकारी नौकरियों से आगे बढ़ाकर उच्च शिक्षा तक विस्तारित किया और लाखों युवाओं के लिए शिक्षा एवं अवसरों के नए द्वार खोले।

इस प्रकार मंडल की अवधारणा केवल रोजगार तक सीमित नहीं रही, बल्कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर की आधारशिला बनी।

मंडल के बाद भारतीय राजनीति में व्यापक परिवर्तन दिखाई दिए। संसद, विधानसभाओं, पंचायतों, विश्वविद्यालयों और प्रशासनिक सेवाओं में पिछड़े वर्गों की भागीदारी बढ़ी। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, बिहार में लालू प्रसाद यादव, राष्ट्रीय स्तर पर शरद यादव, रामविलास पासवान और जॉर्ज फर्नांडिस सहित समाजवादी आंदोलन के अनेक प्रमुख नेताओं तथा बहुजन आंदोलन के प्रणेता कांशीराम ने सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में स्थापित किया।

आगे चलकर नीतीश कुमार, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसे नेताओं ने भी सामाजिक न्याय की राजनीति को नए दौर में आगे बढ़ाया। इन नेताओं ने लोकतंत्र में भागीदारी को केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान और संवैधानिक अधिकार का प्रश्न बनाया।

फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि सामाजिक न्याय की यात्रा अभी अधूरी है। प्रतिनिधित्व बढ़ा है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, भूमि, निजी क्षेत्र में अवसर, न्यायपालिका, मीडिया और कॉरपोरेट संस्थानों में सामाजिक विविधता जैसे प्रश्न आज भी गंभीर बहस का विषय हैं। इसलिए मंडल दिवस केवल अतीत का उत्सव नहीं, बल्कि वर्तमान का आत्ममंथन और भविष्य का संकल्प भी है।

आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब यह स्मरण रखना आवश्यक है कि विकास केवल आर्थिक प्रगति का नाम नहीं है। वास्तविक विकास वही है जिसमें समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान, अवसर और भागीदारी प्राप्त करे।

सामाजिक न्याय किसी वर्ग के विरुद्ध नहीं है। यह संविधान में निहित समानता, न्याय और बंधुत्व के आदर्शों को व्यवहार में उतारने का माध्यम है। किसी ऐतिहासिक रूप से वंचित समाज को अवसर और प्रतिनिधित्व देना किसी दूसरे के अधिकार छीनने का विचार नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक व्यापक और अधिक न्यायपूर्ण बनाने की प्रक्रिया है।

7 अगस्त का मंडल दिवस हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र की मजबूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व, समान अवसर और न्यायपूर्ण व्यवस्था से होती है।

इसलिए मंडल दिवस किसी एक वर्ग का दिवस नहीं, बल्कि भारतीय संविधान की उस लोकतांत्रिक चेतना का दिवस है, जो हर नागरिक को सम्मान, समान अवसर और भागीदारी का अधिकार देती है।

यह उस संघर्ष को याद करने का दिन है जिसने सत्ता के दरवाजों पर दस्तक दी और कहा कि लोकतंत्र में केवल कुछ लोगों की भागीदारी पर्याप्त नहीं है—लोकतंत्र तभी पूर्ण होगा, जब समाज के हर हिस्से की आवाज सत्ता और व्यवस्था में सुनाई दे। यही 7 अगस्त का संदेश है।यही सामाजिक न्याय की पुकार है। यही भारतीय गणराज्य की लोकतांत्रिक आत्मा है।और यही एक समावेशी, न्यायपूर्ण तथा मजबूत भारत की आधारशिला भी है।

लेखक निसार अहमद समाजवादी जन चिंतक हैं।

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