✍️ निसार अहमद
मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को बचाना केवल एक विश्वविद्यालय को बचाना नहीं, बल्कि आज़ादी की विरासत, तालीम और हज़ारों ग़रीब बच्चों के भविष्य को बचाना है।
जौहर यूनिवर्सिटी का नाम केवल एक शैक्षणिक संस्थान के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए, बल्कि इसे भारत के स्वतंत्रता संग्राम की एक गौरवशाली विरासत के रूप में भी देखा जाना चाहिए। इसका नाम महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर पत्रकार, शिक्षाविद और राष्ट्रवादी नेता मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया है, जिनका पूरा जीवन देश की आज़ादी, आत्मसम्मान और शिक्षा के लिए समर्पित रहा।

मौलाना मोहम्मद अली जौहर का परिवार स्वतंत्रता आंदोलन का एक गौरवपूर्ण अध्याय है। उनके बड़े भाई मौलाना शौकत अली और उनकी माता बी अम्माँ (आबादी बानो बेगम) ने भी अंग्रेज़ी हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। अली बंधुओं और बी अम्माँ ने अपने त्याग, साहस और बलिदान से स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी। यह वह परिवार था जिसने निजी सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर देश और समाज को प्राथमिकता दी।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली ने खिलाफ़त आंदोलन का नेतृत्व किया। महात्मा गांधी ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया और इसे असहयोग आंदोलन के साथ जोड़कर अंग्रेज़ी हुकूमत के विरुद्ध एक व्यापक राष्ट्रीय जनआंदोलन का स्वरूप दिया। अली बंधुओं और महात्मा गांधी की यह साझी लड़ाई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू–मुस्लिम एकता की सबसे सशक्त मिसालों में गिनी जाती है। इस आंदोलन ने देश के कोने-कोने में स्वतंत्रता की चेतना जगाई और अंग्रेज़ी शासन की नींव को चुनौती दी। यह केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय एकता, साझी विरासत और आज़ादी के लिए सामूहिक संघर्ष का प्रतीक भी था।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि अपने दौर के सबसे निर्भीक पत्रकारों में भी थे। उन्होंने 1911 में अंग्रेज़ी साप्ताहिक ‘द कामरेड’ (The Comrade) की स्थापना की, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नीतियों को खुलकर चुनौती दी। इसके बाद उन्होंने उर्दू अख़बार ‘हमदर्द’ निकाला, जो राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन की बुलंद आवाज़ बन गया। उनकी पत्रकारिता सत्ता की खुशामद नहीं, बल्कि सच बोलने और जनता को जगाने का माध्यम थी।

1930 में लंदन में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन में मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने ब्रिटिश हुकूमत के सामने कहा था कि “मुझे आज़ादी का परवाना चाहिए। मैं एक ग़ुलाम मुल्क में वापस जाकर मरना नहीं चाहता। अगर हिंदुस्तान को आज़ादी नहीं मिलती, तो मुझे किसी आज़ाद मुल्क की सरज़मीन में दफ़ना दिया जाए।” यह केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि आज़ादी के लिए उनके अटूट संकल्प का उद्घोष था। कुछ ही समय बाद लंदन में उनका निधन हो गया और उनकी इच्छा के अनुरूप उन्हें बैतुल मुक़द्दस (यरूशलम) में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
इसी महान विरासत को शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ाने का सपना उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद और समाजवादी नेता मोहम्मद आज़म ख़ान ने देखा। उनका उद्देश्य केवल एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना नहीं था, बल्कि ऐसा तालीमी केंद्र बनाना था जहाँ समाज के ग़रीब, वंचित, शोषित और पिछड़े तबकों तथा आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के बच्चे भी सम्मान के साथ उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। उनका विश्वास था कि तालीम ही वह ताक़त है जो समाज की तक़दीर बदल सकती है।
आज जौहर यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले अनेक छात्र ऐसे परिवारों से आते हैं, जिनके लिए बड़े शहरों में जाकर महँगी शिक्षा हासिल करना संभव नहीं है। किसी किसान का बेटा, किसी मज़दूर की बेटी, किसी छोटे दुकानदार या साधारण परिवार का बच्चा—इनके लिए यह विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि उम्मीद, आत्मविश्वास और बेहतर भविष्य का रास्ता है।
किसी भी तालीमी इदारे की अहमियत केवल उसकी इमारतों से नहीं होती, बल्कि उन सपनों से होती है जो उसकी कक्षाओं में आकार लेते हैं। जब कोई विश्वविद्यालय संकट में पड़ता है, तो केवल उसकी दीवारें नहीं, बल्कि उन हज़ारों विद्यार्थियों की उम्मीदें भी प्रभावित होती हैं, जो किताबों के सहारे अपनी तक़दीर बदलने का सपना देखते हैं।
जौहर यूनिवर्सिटी के इतिहास में विवाद और प्रशासनिक कार्रवाइयाँ भी होती रही हैं। अलग-अलग सरकारों के दौरान सार्वजनिक रास्तों और अन्य प्रशासनिक मामलों को लेकर विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद सामने आए। बाद के वर्षों में भी कई कानूनी और प्रशासनिक मामले चर्चा का विषय बने। इन घटनाओं पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन शिक्षा के संस्थानों का संरक्षण और उनका भविष्य सुरक्षित रखना सरकार और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
आज जब जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर फिर चिंताएँ सामने आ रही हैं, तो यह सवाल केवल एक विश्वविद्यालय का नहीं रह जाता। यह उस विरासत का सवाल है, जिसका संबंध मौलाना मोहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, बी अम्माँ और उस स्वतंत्रता आंदोलन से है जिसने भारत को आज़ाद कराने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यह उस सपने का भी सवाल है, जिसे मोहम्मद आज़म ख़ान ने शिक्षा के माध्यम से सामाजिक बदलाव का आधार बनाने के लिए देखा था।
मोहम्मद आज़म ख़ान के राजनीतिक जीवन और उनसे जुड़े विवादों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि उन्होंने जौहर यूनिवर्सिटी जैसी विशाल शैक्षणिक संस्था की स्थापना का प्रयास किया, जिसका उद्देश्य शिक्षा को समाज के वंचित वर्गों तक पहुँचाना था। किसी भी व्यक्ति के राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन इतिहास अपने तरीके से करता है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्य और उनसे लाभान्वित होने वाली पीढ़ियाँ भी इतिहास का हिस्सा बनती हैं।
जौहर यूनिवर्सिटी को बचाना केवल एक विश्वविद्यालय को बचाना नहीं है, बल्कि एक ऐसी विरासत को बचाना है जिसमें आज़ादी का संघर्ष, हिंदू–मुस्लिम एकता की मिसाल, तालीम का सपना और उन हज़ारों ग़रीब बच्चों की उम्मीदें शामिल हैं, जो शिक्षा के सहारे अपनी दुनिया बदलना चाहते हैं। शिक्षा की यह विरासत केवल एक इमारत की नहीं, बल्कि उन मूल्यों की है जो एक बेहतर, शिक्षित और समानतापूर्ण समाज का निर्माण करते हैं।
सरकार से मेरा विनम्र अनुरोध है कि जौहर यूनिवर्सिटी को केवल राजनीतिक या प्रशासनिक विवादों के दायरे में न देखा जाए, बल्कि शिक्षा, इतिहास और सामाजिक न्याय के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी उसका मूल्यांकन किया जाए। यदि विश्वविद्यालय से जुड़े किसी भी प्रकार के कानूनी या प्रशासनिक प्रश्न हैं, तो उनका समाधान संविधान और न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप अवश्य किया जाए, शिक्षा जैसे मामलों में कुछ नियमों को शिथिल किया जाय ताकि इस प्रक्रिया में हज़ारों विद्यार्थियों की शिक्षा, उनके भविष्य और इस संस्थान की शैक्षणिक गरिमा किसी भी प्रकार से प्रभावित न हो।
शिक्षा के संस्थान किसी भी सभ्य समाज की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। उन्हें कमज़ोर करना नहीं, बल्कि और अधिक सशक्त बनाना समय की आवश्यकता है। जौहर यूनिवर्सिटी जैसी संस्थाएँ समाज के वंचित, शोषित, पिछड़े और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लिए आशा और अवसर का केंद्र हैं। सरकार से अपेक्षा है कि वह इस विरासत की रक्षा करते हुए ऐसा समाधान निकाले, जिससे न्याय भी सुनिश्चित हो, शिक्षा भी सुरक्षित रहे और विद्यार्थियों का भविष्य भी उज्ज्वल बना रहे। यही स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों, भारतीय संविधान की भावना और एक प्रगतिशील समाज की पहचान होगी।

