✍️ गिरजाशंकर कुशवाहा ‘कुशराज’
सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति के अग्रदूत, महान किसान समाजसुधारक, सामाजिक न्याय की बुलंद आवाज, किसान साहित्य के प्रणेता, किसानवादी दार्शनिक, परिवर्तनकारी लेखक, राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा फुले जी की 11 अप्रैल को 200वीं जयंती मनाई जा रही है। आज की युवा पीढ़ी को ज्योतिबा फुले जी के विचारों से जोड़ते हुए समावेशी समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करने हेतु 200वीं महात्मा फुले जयंती के उपलक्ष्य में भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय दो वर्ष (2026 से 2028 तक) चलने वाले राष्ट्रव्यापी समारोह का शुभारंभ कर रहा है। किसान जातियों की स्थिति और जातीय चेतना को ध्यान में रखते हुए भाजपा सरकार जाति जनगणना और यूजीसी समता कानून के बाद महात्मा फुले जी पर केंद्रित दो वर्षीय राष्ट्रव्यापी समारोह आयोजित कराने का फैसला किसान जातियों का वोट हासिल करने के उद्देश्य से ले रही है। किसान जातियों को चुनावों में उन पार्टियों को वोट करना है, जिन पार्टियों में किसान जाति के नेता शीर्ष नेतृत्व में हैं और जिन पार्टियों की विचारधारा किसान जातियों के विकास पर केंद्रित है। किसानवादी विचारधारा पर चलने वाली पार्टियाँ ही सत्ता में आकर किसान जातियों के साथ न्याय कर सकती हैं।
राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा फुले जी महाराष्ट्र में सतारा जिले के कटगून गाँव में 11 अप्रैल 1827 को किसान जाति – कुशवाहा / सैनी / माली में जन्मे थे।
किसानी धर्म के संस्कार उन्हें अपने पुरखे-पुरखिनों से मिले थे। उनके पिता ‘गोविंदराव फुले’ और दादा ‘शेटीबा’ थे। माता ‘विमलाबाई फुले’ थीं और नाना ‘झगड़े पाटिल’ थे। जोतिबा के जन्म के एक साल बाद ही माताजी का निधन हो गया तब सगुणाबाई ने जोतिबा का लालन-पालन किया। जब जोतिबा 7 वर्ष के हुए तब उन्होंने गाँव की पाठशाला में शिक्षा लेना शुरू किया। उस समय उच्च जातियों यानी ब्राह्मण जातियों के पुरुषों को छोड़ दें तो अन्य जातियों की शिक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी और ब्राह्मण जातियों की दृष्टि में किसान जातियों का शिक्षा प्राप्त करने का प्रयत्न करना ही एक अपराध था तब किसान पिता गोविंदराव ने एक युगान्तकारी निर्णय लिया कि वे जोतिबा को पढ़ाएंगे। कुछ समय बाद, किसान जातियों की शिक्षा के विरोधी समाज के ठेकेदारों के विरोध करने पर जोतिबा को स्कूल से हटा लिया गया। स्कूल से हटने के बाद जोतिबा अपने पिता के साथ किसानी और बागवानी करने लगे। स्कूल भले ही छूट गया हो लेकिन शिक्षा का रंग जोतिबा पर चढ़ गया था। किसानी और बागवानी से शेष बचे समय में जोतिबा किताबें पढ़ते थे और बुजुर्गों से विविध विषयों पर परिचर्चा करते थे। शिक्षा के प्रति इसी समर्पण ने जोतिबा को किसान जातियों का युगपुरुष बनाया।
सन 1840 में 13 वर्ष की आयु में जोतिबा का सतारा के नायगाँव के खंडोजी नेवसे पाटिल की 8 वर्ष की पुत्री सावित्रीबाई से विवाह हुआ। सावित्रीबाई की शिक्षा अर्जित करने की प्रबल इच्छा थी इसलिए जोतिबा ने पत्नी सावित्रीबाई को शिक्षा दी और उन्होंने सावित्रीबाई के पति के साथ गुरू का दर्जा पाया। जोतिबा ने समाज की प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों के निष्कर्षों से जाना कि किसान जातियों, दलित जातियों और स्त्रियों की दुर्दशा का मुख्य कारण अशिक्षा है। ज्ञान के सारे रास्तों पर ब्राह्मण जातियों का पहरा है। वे अन्य जातियों तक आसानी से ज्ञान पहुँचने ही नहीं देते। किसान जातियों, दलित जातियों और स्त्रियों के लिए तो उन्होंने ग्रन्थों / वेद-पुराणों का पठन-पाठन तक मना कर दिया था।
सन 1847 में फुले जी ने थॉमस पेन की किताब ‘राइट्स ऑफ मेन’ पढ़कर मानव-अधिकारों को जाना और किसानों, दलितों और स्त्रियों को मानव-अधिकार दिलाने की लड़ाई लड़ने की ठानी। एक वर्ष बाद, सन 1848 में फुले जी ने युगांतकारी निर्णय लिया कि जिन जातियों के स्त्री-पुरुषों के लिए शिक्षा अप्राप्य है, उनके लिए सबसे पहले शिक्षा की व्यवस्था की जाए। स्त्रियों, किसान जातियों और दलित जातियों के लिए हिन्दू धर्म ग्रन्थों के अनुसार शिक्षा निषिद्ध / पाबंदी है तो उनके लिए ही नए स्कूल खोले जाएँ। फुले जी ने अपने शिक्षा दान के मिशन को साकार करने के लिए पूना के बुधवार पेठ में अगस्त, सन 1848 में किसान और दलित छात्र-छात्राओं के लिए पहली पाठशाला खोली। महात्मा फुले जी की दार्शनिक दृष्टि ने यह समझ लिया था कि जब तक हम स्त्रियों, किसान जातियों और दलित जातियों को आगे नहीं बढ़ाएंगे तब तक समाज में व्याप्त अंधविश्वास और अन्याय दूर नहीं भागेगा।
किसान जातियों की दुर्दशा का मुख्य कारण अशिक्षा ही था इसलिए फुले जी कहते हैं –
“विद्या बिना मति गई।
मति बिना नीति गई।
नीति बिना गति गई।
गति बिना वित्त गया।
वित्त बिना चरमराए शूद्र।
इतने अनर्थ,
एक अविद्या ने किए।”
सन 1888 में फुले जी ने पूना में ड्यूक ऑफ कनॉट को दिए गए महाभोज में किसानों की फटी-पुरानी पोशाक में उपस्थित रहकर ड्यूक को भारत की किसान जातियों की वास्तिवकता बताने का साहस किया। 63 वर्ष की आयु में 28 नवम्बर 1890 को पुणे, महाराष्ट्र में युगपुरुष फुले जी का निधन हुआ।
भारत किसान जातियों का देश है। पिछड़ा वर्ग में सूचीबद्ध जातियाँ ही किसान जातियाँ हैं। किसानों में पिछड़ा वर्ग ही वास्तविक किसान वर्ग है। हम पिछड़ा वर्ग को किसान वर्ग कहना ज्यादा उचित समझते हैं। हम भारतीय संविधान में एक और संशोधन कराना चाहते हैं कि पिछड़ा वर्ग या अन्य पिछड़ा वर्ग को किसान वर्ग से प्रतिस्थापित किया जाए। किसान वर्ग अनेक जातियों का समुंदर है। कुशवाहा, यादव, पटेल, मौर्य, सैनी, पाल, रायकवार समेत पिछड़ा वर्ग में सूचीबद्ध सैकड़ों जातियाँ ही किसान जातियाँ हैं। किसान जातियाँ राजनीति में जितनी अधिक सक्रिय रहेंगी, उतना तेजी से उनका विकास होगा। किसान जातियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, राजनैतिक और आर्थिक विकास के बिना विकसित भारत की अवधारणा साकार नहीं होगी।
देश में जाति जनगणना और यूजीसी समता कानून के लागू होने से किसान जातियों की दशा में युगान्तकारी परिवर्तन आएगा। जब तक किसान जातियों का चहुँमुखी विकास नहीं होगा तब तक भारत में जाति जरूरी है। जाति हमारी अस्मिता है। जाति से ही संस्कृति और भाषा विकसित हुई है। यदि जाति का विनाश किया तो हमारी अस्मिता, संस्कृति और भाषा का भी विनाश हो जाएगा इसलिए जाति जिन्दा रहनी चाहिए। लेकिन देश से जातिवाद और जातिगत भेदभाव का विनाश होना चाहिए। जातिवाद और जातिगत भेदभाव के विनाश से ही किसान जातियों के साथ सामाजिक न्याय हो सकेगा।
महात्मा फुले जी से पहले किसान जातियों की स्थिति का मूल्यांकन करने का प्रयास किसी ने नहीं किया। ‘किसान का कोड़ा’ (मराठी नाम – ‘शेतकऱ्याचा आसूड’) ग्रंथ में फुले जी ने पहली बार किसान जातियों की दयनीय स्थिति का सजीव चित्रण किया। फुले जी जानते थे कि किसान जातियों की आज जो स्थिति है, उसका मुख्य कारण आर्थिक भेदभाव और असमानता है। हिन्दू धर्म की आड़ में सदियों तक ब्राह्मण जातियों ने जजमानी व्यवस्था के नाम पर किसान जातियों का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और राजनैतिक शोषण किया है।
महात्मा फुले ही ऐसे भारतीय दार्शनिक हैं, जिन्होंने पहली बार किसानों के सवालों पर विचार-विमर्श किया इसलिए हम जोतिबा फुले जी द्वारा सन 1883 में लिखित ग्रंथ ‘किसान का कोड़ा’ (मराठी नाम – ‘शेतकऱ्याचा आसूड’) से ‘किसान साहित्य’, ‘किसान विमर्श’ और ‘किसान अध्ययन’ का प्रारम्भ मानते हैं। फुले का दर्शन सामाजिक न्याय की वकालत करने वाला पहला दर्शन है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, किन्नर विमर्श और विकलांग विमर्श जैसे अस्मितामूलक विमर्शों की भाँति 21वीं सदी में ‘किसान विमर्श’ भी अस्मितामूलक विमर्श के रूप में स्थापित हो रहा है।
हमने 19 अक्टूबर 2019 को अपने ब्लॉग ‘कुसराज की आबाज’ पर प्रकाशित अपने लेख ‘किसान विमर्श’ में ‘किसान साहित्य’ और ‘किसान विमर्श’ को परिभाषित करते हुए लिखा है – “किसान के जीवन पर लिखा गया अनुभूतिपरक एवं स्वानुभूतिपरक साहित्य ही किसान साहित्य है और ऐसा विमर्श जिसमें किसानों हर मनोदशा, भावना और अधिकारों की अभिव्यक्ति हुई हो, वो किसान विमर्श है।” कुशराज जी किसान विमर्श को पाठ्यक्रम में शामिल करने की वकालत करते हुए लिखते हैं – किसानों को अब से समाज, साहित्य, राजनीति और सिनेमा में अगल से सम्मानीय दर्जा दिया जाए। दुनिया के हर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के हर कक्षा के पाठ्यक्रमों में किसान साहित्य और किसान विमर्श को अनिवार्यता के साथ शामिल किया जाए। क्योंकि किसानों के बिना ये दुनिया नहीं चल सकती। इसलिए किसानों की हर माँग को पूरा किया जाए।
हिन्दू धर्म के तीन विशेष वर्गों किसान, दलित और स्त्री के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और शैक्षिक अधिकारों के लिए 19वीं सदी में हुई नई क्रांति पर बनी फिल्म ‘फुले’ भारतीय सिनेमा के इतिहास की अनोखी बदलाओकारी फिल्म है, जो फुले 25 अप्रैल 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई।
फुले फिल्म को देश के गाँव-गॉंव, स्कूल-कॉलेज में दिखाया जाना चाहिए। हम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारत सरकार से अनुरोध करते हैं कि फुले फिल्म को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप एम.ए. हिन्दी में पढ़ाए जाने वाले प्रश्नपत्र सिनेमा अध्ययन के पाठ्यक्रम में अगले सत्र से सम्मिलित किया जाना चाहिए। हम राज्यों सरकारों से भी आग्रह करते हैं कि विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में मानविकी और कला संकाय के विभिन्न पाठ्यक्रमों में अनिवार्य पाठ के अंतर्गत फुले फिल्म का अध्ययन कराया जाना चाहिए।
फुले सबके हैं। फुले ने किसी विशेष जाति, वर्ग और धर्म के कल्याण हेतु काम नहीं किया, उन्होंने हिन्दू धर्म की हर जाति पंडित, किसान, दलित की बेटियों को शिक्षा देने की शुरूआत की। साथ ही अपनी सहयोगी फातिमा शेख के साथ मिलकर मुस्लिम धर्म की शिया और सुन्नी जातियों की बेटियों को शिक्षित किया। फुले ने हिन्दू धर्म की चार जातियों पंडित, किसान, बनिया, मजदूर यानी ब्राह्मण, पिछड़े, व्यापारी, दलित में सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षिक समानता लाने हेतु ब्राह्मणवाद और जातिवाद के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया। फुले आजीवन हिन्दू रहे, वो हिन्दू धर्म के सच्चे रक्षक थे। फुले के समय में भी हिन्दू धर्म अपनी चारों जातियों ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्रिय (किसान), वैश्य (बनिया) और शूद्र (दलित) में सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षिक भेदभाव करता था इसलिए फुले ने भेदभाव के शिकार किसान और दलित जातियों के स्त्री-पुरुषों को धर्म परिवर्तन करके ईसाई, बौद्ध और मुस्लिम बनने से रोका और हिन्दू धर्म से असन्तुष्ट किसान और दलितों को शिक्षा देकर समानता दिलाई। भारतीय समाजसुधार आंदोलनों के अग्रदूतों में से किसान महात्मा जोतिबा फुले के विचारों और मिशन का जितना प्रभाव देश-दुनिया पर पड़ा, उतना राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती इत्यादि का नहीं। जन्म से किसान और कर्म से पंडित होते हुए फुले ने अपने किसान धर्म के दो मुख्य सिद्धांतों – सबको भोजन मिले, सबको कपड़ा मिले से प्रेरित होकर सबको समानता और सबको शिक्षा दिलाने हेतु आजीवन काम किया, जो 21वीं सदी में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में प्रतिफलित हो रहा है।
किसान महात्मा फुले की पत्नी किसानिन सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों, स्त्रियों और समाज के हाशिए के लोगों को शिक्षा दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाई। वह भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं। उन्होनें जोतिबा फुले के साथ मिलकर सन 1848 में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोला और वो उसकी प्राचार्या बनीं। वो भारत के पहले किसान स्कूल की भी संस्थापक थीं। उन्होंने लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले। जिसमें से पहला और 18वाँ स्कूल पुणे में खोला था। किसानिन शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह जिया, जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, स्त्रियों की मुक्ति और स्त्रियों को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं, उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता है।
सावित्रीबाई फुले की ये पंक्तियाँ स्त्रियों को शिक्षा हेतु प्रेरित करतीं हैं और पितृसत्ता को स्त्री शिक्षा का विरोधी ठहराती हैं – “आखिर कब तक तुम अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों को सहन करोगी। देश बदल रहा है। इस बदलाव में हमें भी बदलना होगा। शिक्षा का द्वार जो पितृसत्तात्मक विचार ने बंद किया है, उसे खोलना होगा।”
सावित्रीबाई फुले ने स्त्री-पुरूष समानता के लिए भी आवाज बुलन्द की। वो कहती हैं – “स्त्रियाँ सिर्फ रसोई और खेत पर काम करने के लिए नहीं बनीं हैं, वे पुरुषों से बेहतर कार्य कर सकती हैं।”
पंकज शुक्ल फुले फिल्म की समीक्षा करते हुए कहते हैं – “फुले बहुत सारे स्कूलों में अब भी नहीं पढ़ाए जाते। देश की तमाम आबादी को पता ही नहीं कि जब महाराष्ट्र और गुजरात एक सूबा के हिस्से थे और बॉम्बे प्रेसीडेंसी कहलाते थे, तब के महाराज ने देश में पहली बार किसी को आधिकारिक रूप से महात्मा की उपाधि दी थी, मोहनदास करमचंद गाँधी के महात्मा गाँधी बनने से भी पहले।”
हम भारत सरकार से विशेष आग्रह करते हैं कि फुले दम्पति को देश के हर पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाए और भारत में शिक्षा की क्रांति लाने वाले फुले दम्पति की मूर्तियाँ हर शिक्षा संस्थान में स्थापित की जाए। फुले दम्पति के जीवन संघर्ष को पाठ्यक्रम में समाहित होने और उनकी मूर्तियाँ स्थापित होने से नए भारत में भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप शिक्षा की क्रांति लाने हेतु शिक्षक-शिक्षिकाएँ और छात्र छात्राएँ प्रेरित हो सकेंगे।
फुले फिल्म को महात्मा किसान जोतिबा फुले जयंती के पावन पर्व पर 11 अप्रैल 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज होना था लेकिन महाराष्ट्र के किसान यानी पिछड़ा वर्ग विरोधी और हिन्दू धर्मसुधार विरोधी ब्राह्मण संगठनों ने आंदोलन करके फुले को रिलीज नहीं होने दिया। इन किसान विरोधी ब्राह्मण संगठनों ने सेंसर बोर्ड से कहकर फुले फिल्म से 19वीं सदी में ब्राह्मणवाद के चलते ब्राह्मणों द्वारा किसान, दलित और स्त्री वर्ग पर किए गए अत्याचारों और कुकर्मों के दृश्यों को हटवा दिया। महान किसान हिन्दू दम्पति के जीवन पर बनी फिल्म फुले का ब्राह्मणवादी हिन्दुओं द्वारा किया गया विरोध 21वीं में सदी हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी क्षति है।
फुले फिल्म भारत को पुनः विश्वगुरू के सिंहासन पर आसीन कराने में समर्थ है। फुले फिल्म महान हिन्दू धर्मसुधारक, भारत में किसान-दलित और महिला अधिकार आंदोलन के अग्रदूत, महिला शिक्षा के लिए जीवन समर्पित करने वाले आदर्श दम्पति राष्ट्रपिता महात्मा किसान जोतिबा फुले और शिक्षा की देवी राष्ट्रमाता किसानिन सावित्रीबाई फुले की संघर्षगाथा है। जो हर भारतीय को समाज सुधार हेतु प्रेरणा देती है, नए भारत के संकल्पों को साकार करने की शक्ति देती है। फुले फिल्म किसान और दलित जातियों के साथ ही स्त्रियों के अतीत, वर्तमान और भविष्य को दिखाती है, उनकी समस्याओं और समाधानों दिखाती है। किसान जातियों और दलित जातियों के साथ ही विभिन्न जातियों की स्त्रियों में बदलाओकारी चेतना जगाती है। देश की 70 प्रतिशत जनसंख्या किसान जातियों की ही है। इसलिए किसान जातियों के सशक्तिकरण बिना भारत विश्वगुरू नहीं बन सकता। किसान जातियों के चहुँमुखी विकास से ही भारत विकसित राष्ट्र बन सकेगा।
।। जै जै किसान ।।
।। जै जै फुले ।।

लेखक – गिरजाशंकर कुशवाहा ‘कुशराज’
(शोधार्थी – हिन्दी, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी
एवं पूर्व इतिहासकार – सीसीआरटी, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार)
