प्रकाश पर्व के बहाने

✍️ बसावन इंडिया डेस्क

जब मानव ने पहली बार आग जलाई होगी तो यह उसकी कल्पनाओं से परे रहा होगा कि भविष्य में आग मानव सभ्यता की धुरी बनेगी। आग का आविष्कार मानव जीवन की क्रांतिकारी घटना थी। आग के आविष्कार के बाद ही मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आये। इसके बाद से मनुष्य ने कच्चे मांस/अनाज के स्थान पर पके हुए भोजन का सेवन किया। आग और आग जलाने की विधियों ने उसे कहाँ से कहाँ तक पहुंचा दिया। जहाँ रॉकेट में लगी आग से वह मंगल ग्रह तक पहुंचने में कामयाब रहा, वहीं हवाई जहाज में ईंधन से वह दुनिया के किसी भी कोने में थोड़े ही समय में पहुंचने में सक्षम हो गया।

 

 

आग की खोज के क्रम में दिए गए आविष्कार किया गया होगा। आग और उसका प्रकाश देर तक टिके रहे चलते रहे, जलते रहे, इसके लिए कुशल जलाने वालों की जरूरत हुई, इसी जरूरत ने मानव को वैज्ञानिक बनाया होगा और लकड़ी लगातार जलती रहे-उजाले / प्रकाश के लिए यह सतत महत्व का कार्य रहा होगा।

घी के खोजकर्ता और घी के दिए

प्रकाश आज बिजली से मिलता है, और कई बार महीनों या साल भर तक बिजली जलती रहती है लेकिन याद कीजिए 30-40 साल पहले जब गांव में आग को जिलाकर के रखा जाता था और गांव भर के लोग मांग-मांग कर, आग ला-कर चूल्हा जलाते थे। कल्पना कीजिए 300-400 साल पहले जब किरोसिन आयल या मिट्टी का तेल सतत रोशनी का सबसे बड़ा साधन बना।

जब देश में चरवाहा- हरवाहा विश्वविद्यालय बनेंगे लेकिन रोशनी के इस अनोखी खोज को जन-जन तक पहुंचाने और उसके ज्ञान की पहुंच सब तक बनाए रखने के लिए अमावस की रात का उत्सव मनाया गया होगा क्योंकि थोड़े घी में बने दिए में 10-20 नहीं बल्कि 50-100 लोग न केवल बैठ बल्कि नाच गा सकते रहे होंगे। बाकी लोग रोशनी के उत्सव को चाहे जैसे लें लेकिन भैंस, बकरी, भेड़, गाय, सुअर, ऊंट चराने वाले लोगों के लिए रोशनी के उत्सव को किसी और तरीके से देखा जाना बहुत कम तार्किक है।
घी की रोशनी की यात्रा में तेल का छौंका कब लगा, यह भी बहुत रोचक हो सकता है। घी की मानव सभ्यता की यात्रा यही बताती है कि पशुपालन अर्थव्यवस्था के बाद खेती बारी की अर्थव्यवस्था पली बढ़ी। जंगलों- पहाड़ों- पठारों और गंगा-यमुना के विशाल मैदान में कौन से पौधे के बीज से तेल निकाला गया, उसे चखकर खाने योग्य बनाया गया, इसके लिए हजारों नहीं लाखों लोग तेल पेरने चले गए होंगे। वो सरसों, तिल, तीसी, मूंगफली या जिसका भी तेल निकाला गया, वो इतिहास की यात्रा में शामिल है, भले ही इतिहास के पन्नों में गायब हो। चरने और मानवता के लिए उपयोगी तेलों का पता लगाने के बाद इसे निरंतर पेरना-तेल निकालना निहायत कुशल कार्य रहा। देश में तेल निकालने वाले लोगों का शायद वही मान रहा होगा जो आज इसरो के वैज्ञानिकों का या एम्स के डॉक्टर का। लेकिन बल्ब के साथ इसका भाव गिरना और तेली कब “तेलिया मसान खोपड़ी” का डर समाज में पैदा हुआ, यह तो इतिहास के विद्यार्थियों के लिए रोचक हो सकता है, लेकिन घी के बाद आग में तेल डालना/लगाना या कि तेल में बाती दे कर दिया बनाना और उसे निरंतर रोशनी का साधन बनाने वाले वैज्ञानिकों को सलामी आज भी दी जा सकती है। वही सरसों, तीसी, रेंड़ी आदि का तेल घी के साथ दिए जलाने से लेकर पुड़ी पकवान में भी घी का विकल्प बन कर उभरा और सबको मालिश करने-कराने और सेहत बनाने में भी सहायक बना। ये अलग बात है कि तेल के कारीगर- वैज्ञानिक कब और कैसे मुंह दिखाने काबिल नहीं और अपशकुन का माध्यम बने। यह भी अध्ययन और शोध का विषय है।

धीरे धीरे रोशनी के कार्य से घी और तेल बाहर हुए क्यों कि वाट जैसे वैज्ञानिक, परमाणु ऊर्जा जैसे ईंधन के बाद 24×7 बिजली जो आ गई है लेकिन खाने और सेहत बनाने में घी और तेल अब भी नंबर वन हैं।
कल्पना कीजिए कि सतत रोशनी की मशाल किसने जलाई रखी। वो घी और तेल का अविष्कार जलाने के लिए शोध अध्ययन का विषय है। घी और तेल जो आज मोटापे का कारण बन रहा है, कभी सेहत और रोशनी का सबसे बड़ा साधन थे।
कैसे बना घी? कैसे बना तेल? भैंस-गाय-बकरी-भेड़ को कब पालतू बनाया गया, कैसे पालतू बनाया गया यह इतिहास की हजारों साल की यात्रा थी। जिन लोगों ने भैंस के दूध की मानव जाति के लिए उपयोगिता तय की होगी, उनका नाम इतिहास में लिखा जाना बाकी है।
दूध से दही बना बायोकेमिस्ट्री के उस लैब में जो गुमनाम वैज्ञानिक थे उनके वंशज आज इसी धरती पर भैंस-गाय बकरी चरा रहे हैं। ये इंडिया जिसके वैज्ञानिकों का कभी डंका बजता रहा होगा, जिन्होंने हड़प्पा जैसे नगर बसाए, क्या उन्हीं लोगों से मिलते जुलते जेनेटिक लोगों ने दही से मथ कर घी निकाला होगा? और सबसे बढ़कर इतने कीमती घी को आग में डालने वाला वो जांबाज, उत्साही, साहसी वैज्ञानिक जिसने आग में घी डालने का प्रयोग किया। घी लगातार रोशनी दे सकता है। उस पर रोशनी बाकी है।

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