रैदास का बेगमपुरा, शोषण मुक्त समाज का स्वप्न

लेखक – मिथलेश कुमार सिंह

भारतीय इतिहास और साहित्य में “आदर्श समाज” की कल्पना एक ही नहीं रही है जहाँ तुलसीदास रामराज्य की संकल्पना प्रस्तुत करते हैं, वहीं उनसे बहुत पहले लोककवि कबीर अमरदेसवा और संत रैदास बेगमपुरा जैसे वैकल्पिक समाज की परिकल्पनाएँ जनमानस तक पहुँचाते रहे हैं ये कल्पनाएँ केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि गहराई से सामाजिक और राजनीतिक हैं।

कबीर और रैदास को पढ़ना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वे उस समाज की बात करते हैं जो शोषितों, बहिष्कृतों और हाशिये पर खड़े लोगों का सपना था तुलसी का रामराज्य बनाम कबीर का अमरदेसवा तुलसीदास का रामराज्य वर्ण-व्यवस्था पर आधारित है उसमें हर व्यक्ति अपने-अपने वर्ण और आश्रम के “निज धर्म” का पालन करता है और वेद ही सामाजिक कानून हैं तुलसी दास लिखते हैं:-

“वरनाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहिं भम सोक न रोगा॥”

अर्थात सुख-शांति का आधार वर्ण-व्यवस्था और वेदसम्मत आचरण है।

इसके ठीक उलट कबीर अमरदेसवा में लिखते हैं एक ऐसा देश जहाँ न जाति है, न धर्म, न हिंदू, न मुसलमान, और न ही देवताओं का कोई प्रभुत्व, कबीर कहते हैं:-

“ब्राम्हण छत्री न शूद बैसवा, मुगल पठान नहीं सैयद सेखवा।
आदि जोति नहिं गौर गनेसवा, ब्रह्मा विस्नु महेस न सेसवा॥”

रैदास का बेगमपुरा: शोषणमुक्त समाज का स्वप्न जहाँ सत्ता, पहचान और वर्चस्व के सारे प्रतीक ध्वस्त कर दिए जाते हैं। रैदास और तुलसी दोनों वैचारिक रूप से बिल्कुल विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं। रैदास ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व और धार्मिक पाखंड पर बेहद तीखे प्रहार किए हैं रैदास लिखते हैं:-

“बांभन झूठा, वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्मा अकेला रे।
मंदिर भीतर मूरति बैठी, पूजति बाहर चेला रे॥”

“पत्थर मूरति कछु न खाती, खाते बांभन चेला रे।
जनता लूटति बांभन सारे, प्रभु जी देति न अधेला रे॥”

“रैदास बाभन न पूजिये जो हो ज्ञानगुन हीन।
पूजिये चरन चंडाल के जो होवे गुन ज्ञान प्रवीन॥”

यह आलोचना किसी दार्शनिक बहस से नहीं, बल्कि अपनी जाति के कारण भोगे गए यथार्थ से जन्म लेती है यही कारण है कि कबीर और रैदास पुनर्जन्म, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक जैसी अवधारणाओं को भी शोषण का औज़ार बताते हैं। कबीर और रैदास दोनों कहते हैं, ईश्वर न मंदिर में है, न मस्जिद में, न काशी में, न मथुरा में वह ईश्वर की कल्पना को नकार कर मनुष्य के भीतर ही ईश्वर को देखते हैं।

कबीर, रैदास, घासीदास, बुल्ले शाह और बाबा फ़रीद ने भारतीयता की सीमाओं से आगे बढ़कर मनुष्यता, न्याय, समता और गरिमा की बात की है उन्होंने वाल्मीकि, तुलसीदास और सूरदास द्वारा प्रतिपादित वर्ण-व्यवस्था आधारित समाज के समानांतर एक ऐसे समाज का सपना देखा, जहाँ मनुष्य की पहचान जाति या धर्म से नहीं, उसके कर्म और श्रम से हो फिर भी आज इन्हें याद करने वाले अधिकांश लोग किसान, कामगार, मेहनतकश और कमेरा वर्ग ही क्यों हैं?

भारतीय इतिहास और साहित्य में जिस ऊँचे आसन पर तुलसी, वाल्मीकि और सूरदास प्रतिष्ठित हैं, वह स्थान लोककवि कबीर, रैदास, घासीदास, बुल्ले शाह और बाबा फ़रीद जैसे लोककवियों को क्यों नहीं मिला?

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