ओबीसी रहनुमा ओबीसी अधिकारों के हनन पर चुप क्यों?

✍️ मिथलेश कुमार सिंह 

देश की राजनीति में आज “बुलडोज़र” सिर्फ़ एक प्रशासनिक औज़ार नहीं रह गया है, बल्कि वह एक प्रतीक बन चुका है सत्ता की निरंकुशता का, असहमति को कुचलने का और संवैधानिक अधिकारों पर चुपचाप वार करने का चिंता की बात यह है कि इस बुलडोज़र की दिशा अब केवल घरों या बस्तियों तक सीमित नहीं दिखती, बल्कि वह सीधे OBC, SC, ST के आरक्षण और अधिकारों की ओर बढ़ता प्रतीत हो रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस शासन-सत्ता की व्यवस्था में OBC समाज के नाम पर कई बड़े चेहरे मौजूद हैं, क्या उनमें से कोई भी इस बुलडोज़र के सामने जायज मांगों को लेकर खड़ा होने की राजनीतिक और नैतिक हिम्मत रखता है?

सत्ता में OBC के नाम पर कई बेआवाज़ बड़े चेहरे केशव प्रसाद मौर्या, अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद, जयंत चौधरी, ओम प्रकाश राजभर, पंकज चौधरी मौजूद हैं ये सभी नाम खुद को पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधि बताते हैं इन नेताओं ने OBC समाज के वोटों से सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ीं, मंत्री बने, पद और प्रतिष्ठा हासिल किया है लेकिन जब बात 69000 शिक्षक भर्ती में आरक्षण घोटाला, आरक्षण चोरी, संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी, या सामाजिक न्याय पर हमले की आती है तो यही नेता असहज चुप्पी साध लेते हैं।

यह चुप्पी कोई संयोग नहीं है यह सत्ता से समझौते की चुप्पी है यह उस राजनीति का हिस्सा है जिसमें समाज का इस्तेमाल तो होता है, लेकिन उसके हक़ की लड़ाई नहीं लड़ी जाती प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल किसी समुदाय से आने वाला चेहरा सत्ता में बैठा देना नहीं होता प्रतिनिधित्व का मतलब होता है समाज के सवालों को सत्ता के गलियारों तक ले जाना, ज़रूरत पड़े तो सत्ता से टकराना और संविधान के पक्ष में खड़ा होना।

लेकिन आज की हकीकत यह है कि OBC नेताओं का एक बड़ा वर्ग सत्ता के साथ खड़ा दिखता है, समाज के साथ नहीं। जब आरक्षण को कमजोर करने की कोशिशें होती हैं, जब सामाजिक न्याय के संस्थागत ढांचे पर प्रहार होता है, तब यही नेता “अनुशासन”, “सरकारी निर्णय” और “हिन्दुत्व” की आड़ में चुप्पी साध लेते हैं।

इतिहास गवाह है कि जब भी आरक्षण पर हमला होता है, तो वह चरणबद्ध तरीके से होता है पहले OBC, फिर SC, ST कभी न्यायालय के आदेशों के बहाने, कभी नीतिगत बदलावों के ज़रिए, तो कभी भर्ती प्रक्रियाओं में तकनीकी शर्तें लगाकर अगर आज OBC समाज चुप रहा, तो कल यह बुलडोज़र और तेज़, और निर्दयी होगा अब सवाल नेताओं से ज़्यादा समाज से है। क्या OBC समाज ऐसे नेताओं से संतुष्ट रहेगा जो सत्ता की मलाई तो खाएँ, लेकिन समाज के अधिकारों पर हमले के समय गायब हो जाएँ?

आरक्षण कोई दया या खैरात नहीं है यह सदियों के शोषण के ख़िलाफ़ मिला संवैधानिक अधिकार है जो नेता इस अधिकार की रक्षा नहीं कर सकता, उसे OBC समाज का प्रतिनिधि कहलाने का नैतिक अधिकार भी नहीं है।

 

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