✍️ डॉ. आशाराम यादव
नई दिल्ली। 25 नवम्बर 2025 का दिन पेंशन बहाली आन्दोलन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। जब पूरी व्यवस्था व सरकारों तथा दरबारी दलालों के षड्यंत्रों के बीच दिल्ली में लाखों शिक्षकों/कर्मचारियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। लाख रुकावटें डालने के बाद जब रैली समाप्त हो गई तो दिल्ली पुलिस द्वारा भीड़ अधिक बताकर एनएमओपीएस के राष्ट्रीय पदाधिकारियों पर एफ आई आर दर्ज की गई । परन्तु हम संवैधानिक तरीके से अपने हक़ की लड़ाई लड़ने वाले हैं उसे लड़ते रहेंगें न डरें हैं और न डरेंगे। संघर्ष किया है संघर्ष करेंगे। पुरानी पेंशन लेकर रहेंगे। अटेवा प्रदेश उपाध्यक्ष डा आशाराम ने बताया कि- “उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में अटेवा के जिला संयोजक सहित अनेकानेक पदाधिकारियों को पुलिस द्वारा हाउस अरेस्ट कर डराने की कोशिश की गई परन्तु हम डरने वाले नहीं हैं पुरानी पेंशन बहाली तक हमारा आन्दोलन जारी रहेगा। सरकार अटेवा/एनएमओपीएस के प्रदर्शन से भयभीत होती है इसलिए उसके कार्यक्रम में तरह-तरह की अनावश्यक रुकावटें डालती है। लेकिन हम रुकने वाले नहीं हैं।”
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जिसके संविधान में सबको बराबरी का अधिकार बोलने की आजादी व कहीं पर आने जाने की आजादी दी गई है। कर्मचारियों को भी सरकार के समक्ष अपनी बात रखने की पूरी आजादी है परंतु यह सरकार लोकतंत्र के सारे अधिकार अघोषित रूप से जनता व कर्मचारीयों से छीनने पर आमादा इसका एक ताजा उदाहरण है कि- चार महीने पूर्व एनएमओपीएस ने दिल्ली में पुरानी पेंशन बहाली को लेकर के महारैली की तिथि घोषित किया था एवं समय से रामलीला मैदान में रैली की अनुमति हेतु दिल्ली पुलिस को आवेदन किया था परन्तु दिल्ली पुलिस द्वारा रामलीला मैदान को विभिन्न कारण देकर अनुमति नहीं दी गई। अतः रैली के लिए संगठन को जंतर- मंतर से ही सब्र करना पड़ा। दिल्ली पुलिस ही नहीं सरकार भी जानती कि- जो एनएमओपीएस 1अक्टूबर 2023 को रामलीला मैदान को सुबह 11:00 ही एंट्री बंद करने वाली भीड़ इकट्ठा कर चुका है मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रैली में लगभग बीस लाख कर्मचारी देश के विभिन्न राज्यों व विभागों से दिल्ली आए।

एनएमओपीएस एकलौता संगठन है जिसने अपने मुद्दे के लिए ‘वोट फॉर ओपीएस अभियान’ द्वारा सरकारें बदली ही नहीं अपितु मजबूत कहीं जाने वाली सरकार को घुटने पर ला दिया हो उस एनएमओपीएस और विजय कुमार ‘बन्धु’ से सरकार का डरना उससे दुश्मनी रखना स्वाभाविक ही है। चूंकि हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है लोकतंत्र में संवैधानिक तरीके से सबको अपनी बात करने का पूरा हक़ है।
परन्तु सरकार पूरी तरह से लोकतांत्रिक क्रूरता पर उतारू है लगातार सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं कि- अटेवा/ एनएमओपीएस व सहयोगी संगठनों के पदाधिकारियों को पुलिस द्वारा हाउस अरेस्ट करवाया जा रहा है कुछ जिलों में ट्रांसपोर्ट विभाग द्वारा फोन करके जबरदस्ती बस मालिकों से बसों की बुकिंग को कैंसिल कराया जा रहा है, ट्रेनें बेवजह एक-एक स्टेशन पर कई-कई घंटे रोकी जा रही हैं नोएडा दिल्ली बॉर्डर पर तलाशी अभियान के नाम पर लोगों को रोका जा रहा है तलाशी अभियान तब कहां था जब अभी कुछ दिन पूर्व ही लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास आतंकी घटना हुई जिससे कई जाने गई एवं भारी नुकसान हुआ तब यह तलाशी अभियान या सरकार कहां थी एक बहुत बड़ा सवाल है ? केवल कर्मचारी या आम नागरिक जब दिल्ली जाना चाहते हैं तभी पुलिस चौकन्ना हो जाती है और सरकार भी सक्रिय हो जाती है पुलिस का काम है जनता की रक्षा करना है लेकिन उसे जनता के लिए काम नहीं करने दिया जा रहा है वह केवल सरकार के लिए ही काम करते हुए दिख रही है या कहें सरकारी इशारों की कठपुतली बना दी गई है।
एनएमओपीएस का नेतृत्वकर्ता है एक साधारण सा शिक्षक है जो वह ईमानदार,कर्मठ होने के साथ-साथ जुझारू,साहसी, निर्भीक है जिसे सरकार ना तो गुमराह कर पाई, ना खरीद पाई, ना ही डरा पाई शायद सरकार ने सोचा कि- लोगों को डरा कर,रोक कर तरह-तरह के हथकंडे अपना कर इस आंदोलन को कमजोर किया जा सकता है तो हम बताना चाहते हैं कि-यह सरकार की गलतफहमी है जैसे पानी को कोई नहीं रोक सकता वह अपने जाने के रास्ते बना ही लेता है वैसे ही यह ओपीएस की मशाल जो विजय कुमार ‘बन्धु’ ने जलाई है उसकी लौ धीमी नहीं होगी।ओपीएस की जलधारा रूपी जो भागीरथी निकली है वह अपने गंतव्य पर जाकर ही रुकेगी। इससे पहले रुकने वाले नहीं है सरकार कितनी भी जुगाड़ कर लें जुगत कर लें कितनी भी क्रूरता कर लें मनमानी कर लें जो भी कर लें।
इससे बड़ी क्रूरता क्या हो सकती है कि- एक शिक्षक जो गुरु होता है समाज का सबसे सभ्य व प्रबुद्ध नागरिक माना जाता है जब उससे अपराधी की तरह व्यवहार किया जाता पुलिस आती है और यह बताया जाता है कि-आप घर से बाहर नहीं जा सकते हैं उसका अपराध यह है कि वह पुरानी पेंशन बहाली आन्दोलन का नेतृत्व कर्ता है। यह सरकार की तानाशाही है यह ज्यादा दिन तक चलने वाली नहीं है देश के कोने-कोने पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण, कश्मीर से कन्याकुमारी तक अटक से कटक तक सभी विभागों के कर्मचारी अपनी पुरानी पेंशन बहाली चाहते हैं इसी लिए वह एनएमओपीएस और विजय “बंधु” पर विश्वास करते हैं क्योंकि जो हमारा नेतृत्व है वह बिकाऊ नहीं है टिकाऊ है यही एनएमओपीएस देश के 6 राज्यों में पुरानी पेंशन बहाल करके दिखाया है इसलिए लोगों का विश्वास और मजबूत हुआ है हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा था कि- यदि आपको इतना शौक है तो आप चुनाव लड़ जाएं और अपनी पुरानी पेंशन बहाल कर लें आज वह पूर्व मुख्यमंत्री हो चुके हैं कर्मचारियों ने अपना दम दिखाया और पुरानी पेंशन बहाली वाली सरकार बनायी।
एनएमओपीएस के पास वोट फॉर ओपीएस का जो ब्रह्मास्त्र है वह सरकार की आंखों का किरकिरी बना हुआ है। बिहार सरकार इसका ताजा उदाहरण जहां पर 243 सीटों में से ओपीएस का वादा करने वाला महागठबंधन 142 सीटों पर पोस्टल बैलेट में जीता है। जबकि ईवीएम वोट में 202 सीटों पर जादुई जीत वाला एनडीए पोस्टल बैलेट में बुरी तरह से हारा। शिक्षक और कर्मचारी अपनी ताकत दिखा रहा कर्मचारी एक वोट बैंक की तरह अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है संवैधानिक तरीके से जैसे उसे करना चाहिए। सरकार की यह सोची समझी रणनीति है कि- हम रामलीला मैदान नहीं देंगे तो रैली की मीडिया रिपोर्टिंग अच्छी नहीं हो पायेगी। यह आंदोलनकारी हैं अंग्रेजों ने भी ऐसे पहले सोचा था और आजादी की जंग में सभी क्रांतिकारियों को तरह तरह से रोका था। उसका क्या हाल हुआ इतिहास इसका साक्षी है।
शहीद ए आजम भगत सिंह ने कहा था -“क्रांति की धार विचारों की शान पर तेज होती है”आज भी उनकी यह बात अक्षरशः सत्य है।ओपीएस आंदोलन एक विचार है क्योंकि – “एनपीएस/यूपीएस निम्न और मध्यम वर्ग के खिलाफ पूंजीपतियों का षड्यंत्र है “यह विचार एनएमओपीएस ने शिक्षक/कर्मचारी ही नहीं बल्कि आम जनमानस में पहुंचा दिया है। इस आन्दोलन में हमारी लड़ाई सरकार से नहीं है अपितु पूंजीवादी व्यवस्था से है जो एनपीएस में 14% सरकार का 10% कर्मचारी का कुल मिलाकर 24% धनराशि जो कि बहुत बड़ा कॉर्पस है देश के करोड़ों शिक्षकों/कर्मचारियों के गाढ़े पसीने की कमाई है को पूंजीपतियों को लुटाई जा रही है। इसलिए कॉर्पोरेट नहीं चाहता है कि- पुरानी पेंशन बहाल हो। सरकारी नीतियों को कार्पोरेट पूरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं इसका नवीनतम् उदाहरण यूपीएस पेंशन योजना है जो सरकार 2024 में लेकर आई है। अब भारत में तीन पेंशन स्कीम है ओपीएस,एनपीएस,यूपीएस इसमें यूपीएस जो टोटली कॉरपोरेट सेक्टर के लिए लायी गई लगती है ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि एनपीएस में तो 14% सरकार का 10% हमारा हो कॉर्पोरेट के पास जाता था उसमें से 60% रिटायरमेंट के समय मिलता था और 40% से हमें पेंशन मिलती थी।
यूपीएस वाकई है कमाल की पेंशन स्कीम है जिसमें सरकार और कॉर्पोरेट का मजबूत गठजोड़ है जिसमें सरकार ने कर्मचारी का 10 परसेंट सरकार का 14% और 4.5% परसेंट एक और पूल कार्पस बनाया है इस तरह से अब कुल धनराशि 24 की जगह 28.5% हो गया है। जो पूंजीपतियों को सीधे दिया जाएगा और इसमें निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है अर्थात जो 28.5% जो धनराशि इक्ट्ठा हो रही है हमारे वेतन और सरकार के अंशदान से वह सीधे पूजीपतियों के पेट में जायेगी। कर्मचारियों को जब वह 60 साल बाद रिटायर होगा तो उसे अंतिम वेतन के औसत का 50% धन पेंशन के रूप में मिलेगा जिसमें महंगाई भत्ता भी नहीं होगा कॉर्पोरेट व्यवस्थाएं अपने अनुरूप बनवा रहा है ऐसा लगता है
ऐसा लगता है भारत गणराज्य नहीं अपितु न्यू ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में तब्दील हो रहा है ईस्ट इंडिया कंपनी में भी तो यही था कि- कार्पोरेट और सत्ता का गठजोड़। जो कार्पोरेट चाहता था सत्ता वही करने पर मजबूर होती थी कुछ परिवर्तनों के साथ यह सरकार भी इसी तरह से चल रही है सबको लड़ना है ध्यान रहे कि जब क्रूरता हद तक बढ़ जाती है तो क्रांति अवश्यंभावी हो जाती है और जब क्रांति आती है तो क्रूर से क्रूर तानाशाह और मजबूत से मजबूत सरकार उखाड़ कर फेंक दी जाती है अंतत: लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है हम मठाधीशों ,कुछ ईर्ष्यालु,वंचक व दरबारी सौदागरों से कहना चाहते हैं कि अगर किसी सुकार्य में कार्य में सहयोग नहीं कर सकते हैं तो विरोध करके अपना नाम आम्भीक की तरह से गद्दारों की सूची में न लिखवायें है पोरस की तरह से बहादुरों की सूची में लिखवायें क्योंकि आपको गद्दार के रूप में और पोरस को बहादुर के याद किया जायेगा। अंत में सिकंदर ने भी पोरस को ही सम्मान दिया था गद्दार आम्भीक को नहीं।
