एक समय था जब आदमी प्रतिरोध करता था तो या तो जेल जाता था या इतिहास में दर्ज होता था। अब नया दौर है। अब आदमी प्रतिरोध करता है और साथ में व्यूज भी बटोरता है लाइक्स भी और एड रेवेन्यू भी। यह प्रतिरोध का नया मॉडल है जिसे आज की भाषा में कंटेंट कहा जाता है।
पहले लोग अन्याय के खिलाफ निकलते थे क्योंकि दिल में दर्द होता था। अब लोग अन्याय के खिलाफ इसलिए निकलते हैं क्योंकि दिल के साथ साथ चैनल का एनालिटिक्स भी धड़क रहा होता है।
सोशल मीडिया भावनाओं की मंडी बन गया है
यूट्यूब फेसबुक और इंस्टाग्राम आज केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं बल्कि भावनाओं की मंडी बन चुके हैं। यहां गुस्सा बिकता है आंसू बिकते हैं आक्रोश बिकता है और सबसे ज्यादा बिकता है विरोध।
अगर आप शांत हैं तो आप अनफॉलो हैं। अगर आप नाराज हैं तो आप ट्रेंड में हैं। अगर आप चीख रहे हैं तो आप वायरल हैं। और अगर आप गाली दे रहे हैं तो आप मोनेटाइज हो चुके हैं।
आपको लगता है आप सिस्टम के खिलाफ बोल रहे हैं लेकिन दरअसल आप एल्गोरिदम के पक्ष में काम कर रहे हैं।
विरोध का नया स्टार्टअप मॉडल
आज विरोध एक स्टार्टअप बन चुका है। सुबह उठते ही पहला काम होता है कि आज किसके खिलाफ बोलना है। फिर रिसर्च नहीं बल्कि स्क्रिप्ट बनती है। फिर एक टाइटल बनता है जो ज्यादा गुस्से वाला हो जैसे सनसनीखेज खुलासा या बड़ा झटका या अब सच सामने आ गया।
उसके बाद वीडियो रिकॉर्ड होता है और पीछे से हल्की सी दुखी म्यूजिक बजाई जाती है ताकि जनता की भावनाएं पिघलें और कमेंट बॉक्स में उबलें।
जैसे ही लोग गुस्से में कमेंट करते हैं एल्गोरिदम खुश हो जाता है और वीडियो और ऊपर चला जाता है। और यहीं से शुरू होती है कमाई की असली बारिश।
सत्ता के विरोधी या सत्ता के फ्रंट मैन
सबसे रोचक बात यह है कि जो लोग सबसे ज्यादा सत्ता का विरोध करते दिखाई देते हैं वही अक्सर सत्ता का सबसे मजबूत सुरक्षा कवच भी होते हैं। ये वही लोग होते हैं जिन्हें पहले से मैदान में उतार दिया जाता है।
ये लोग सत्ता के आलोचक बनकर जनता का गुस्सा अपने ऊपर लेते हैं। जनता सोचती है कि ये हमारे लिए लड़ रहा है। पर असल में यह गुस्सा भी एक नियंत्रित निकास होता है।
लोग सोचते हैं कि उन्होंने कमेंट कर दिया वीडियो शेयर कर दिया तो क्रांति हो गई। जबकि असल में यही गुस्सा ऊपर बैठे लोगों तक साफ फिल्टर होकर जाता है और वहीं वापस रणनीति बनकर लौट आता है।
भावनात्मक मजदूरी का शोषण
आज का आम आदमी अपनी भावनाओं से काम कर रहा है। वह गुस्से में वीडियो देखता है गुस्से में कमेंट करता है गुस्से में शेयर करता है। पर किसी को यह नहीं दिखता कि वह मुफ्त में एक पूरा उद्योग चला रहा है।
यूट्यूब को कंटेंट मिल गया फेसबुक को आंकड़े मिल गए इंस्टाग्राम को ट्रैफिक मिल गया और एक काल्पनिक क्रांतिकारी को पहचान और पैसा दोनों मिल गया।
आम आदमी को क्या मिला
एक अस्थायी संतोष
एक झूठा अहसास कि उसने कुछ बदल दिया
और अगले दिन फिर वही व्यवस्था
ठीक उसी तरह जैसे भाप निकालने का वाल्व
पुरानी मशीनों में एक सेफ्टी वाल्व होता है। उससे भाप निकल जाती है और मशीन फटने से बच जाती है। आज के समाज में सोशल मीडिया वही सेफ्टी वाल्व बन गया है।
जो गुस्सा सड़क पर आना था वह अब कमेंट बॉक्स में आ जाता है।
जो विरोध धरने में दिखना था वह अब स्टोरी में दिख जाता है।
जो क्रांति आंदोलन बननी थी वह रील बनकर खत्म हो जाती है।
सिस्टम खुश है क्योंकि भाप निकल गई। और जनता खुश है क्योंकि उसे लग रहा है कि उसने कुछ कर दिया।
प्रतिरोध जब तक दिल से जुड़ा था तब तक वह खतरनाक था। अब जब वह मोनेटाइज हो गया है तब वह मनोरंजन बन गया है।
जो व्यक्ति आपको रोज गुस्सा दिखा रहा है वह खुद रोज अमीर हो रहा है। और आप हर दिन थोड़ा और हल्के होते जा रहे हैं।
आज की सबसे बड़ी साजिश यह नहीं है कि लोगों की आवाज दबा दी गई है। साजिश यह है कि लोगों की आवाज को एक व्यापार बना दिया गया है।
और इस व्यापार में सबसे सस्ता कच्चा माल है
आपकी भावना
– ✍️मुद्रा राक्षस
