UPPSC में त्रिस्तरीय आरक्षण लागू होने से 86 में 56 यादव SDM का झूठा नरेटिव आरक्षण लागू करने वाले अध्यक्ष अनिल यादव को साजिशन बदनाम करने का हिस्सा था।
RTI एक्टिवस्ट अमन कुमार के RTI पर यह मामला प्रकाश में आया है कि भाजपा सरकार में संजय श्रीनेत को ठीक रविवार (18 अप्रैल 2021) को नियुक्त किया गया है तो यह पूरी तरह वैध कैसे हो गया, यह सरकार व न्यायपालिका का दोहरा मापदंड क्यों है?

विवाद की असली वजह त्रिस्तरीय आरक्षण

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) के अध्यक्ष अनिल यादव द्वारा लागू किए गए त्रिस्तरीय आरक्षण ने राज्य की प्रशासनिक भर्तियों में भूचाल ला दिया। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के सामान्य वर्ग की सीटों पर चयन होने से सवर्ण वर्ग में असंतोष और हलचल मची यहीं से बीजेपी और आरएसएस समर्थित जातिवादी मीडिया ने झूठा नरेटिव गढ़ा राजनीतिक और मीडिया मंचों पर अनिल यादव के फैसले को बदनाम करने के लिए “86 में 56 यादव SDM” का झूठा आंकड़ा प्रचारित किया गया। आयोग में त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था लागू न होने से आज आयोग में आरक्षित वर्ग की मेरिट सामान्य श्रेणी की मेरिट से अधिक जा रही है।

UPPSC के रिकॉर्ड का सच 2011 की संयुक्त राज्य/अधीनस्थ सेवा (मुख्य) परीक्षा में SDM के कुल पद केवल 30 थे। जिसमें कुल 05 यादव का चयन हुआ।

2012 के कुल 32 SDM में से 4 यादव जाति के अभ्यर्थी चयनित हुए थे।

एस डी एम के 86 पद कभी आए ही नहीं
1951 से 2017 तक कभी एसडीएम के 86 पदों की भर्ती ही नहीं हुई तो 86 में 56 यादव का सवाल ही नहीं होता इन्हीं 6 यादव SDM को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद और ब्राह्मण पत्रकारों ने सोची समझी साजिश व दुष्प्रचार के तहत 56 बना दिया था।

झूठे आकड़े प्रचारित किए गए

अलग-अलग वर्षों के आंकड़ों को जोड़कर और उन्हें एक ही साल का बताकर यह भ्रामक प्रचार फैलाया गया जाँच रिपोर्ट के अनुसार यह स्पष्ट डेटा मैनिपुलेशन था, जिसका उद्देश्य त्रिस्तरीय आरक्षण की सफलता को सवालों के घेरे में लाना और पिछड़ी जातियों तथा सामान्य वर्ग के बीच विवाद पैदा करना था।
CBI जांच
प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के साथ ही लोकसेवा आयोग में जांच बैठाई गई लेकिन उसका क्या हुआ किसी को कुछ पता नहीं। यदि वास्तव में आयोग में गड़बड़ी हुई तो दोषियों को दंडित क्यों नहीं किया गया।
राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ यह झूठा नरेटिव उस दौर में जोर-शोर से फैलाया गया, जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी पिछड़ी जातियों में भ्रम और असंतोष फैलाने के लिए इसे बार-बार मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर दोहराया गया भारतीय मीडिया में कभी भी बहुजनों को स्वर्णिम अवसर नहीं मिला उनके मुद्दों और आवाज़ को लगातार नजरअंदाज किया गया। इसके बावजूद समाज के महान नेताओं ने अपने-अपने प्रकाशनों के माध्यम से सच्चाई और न्याय की लड़ाई जारी रखी ज्योतिबा फूले ने दीनबंधु निकाला तो डॉ. भीमराव अंबेडकर ने समता, मूकनायक, बहिष्कारित भारत और पेरियार ने कुदी आरसु, द्रविड़ियन तो मान्यवर कांशीराम ने बहुजन संगठक, दि अप्रेस्ड इंडियन पत्र और पत्रिकाएं निकले इन पत्रिकाओं और प्रकाशनों ने न केवल बहुजन समाज की चेतना जगाई, बल्कि जातिवादी और राजनीतिक नरेटिव के खिलाफ संघर्ष की दिशा भी दिया हैं।
आज भी जातिवादी मीडिया के झूठे और भ्रामक नरेटिव से बहुजन समाज को भ्रमित किया जा रहा है इसका मुकाबला केवल अपने मीडिया, अपने प्लेटफॉर्म और अपने प्रकाशनों के माध्यम से ही संभव है यही बहुजन समाज की आवाज़ को मजबूत करने और सच्चाई को फैलाने का एकमात्र रास्ता है।
बसावन इंडिया ने 86 में 56 के झूठ का पर्दाफाश किया

बसावन इंडिया के विशेष अंक में यह बताया गया है कि “86 में 56 यादव SDM” का दावा न तो किसी आयोग की रिपोर्ट का हिस्सा है और न ही किसी भर्ती प्रक्रिया का तथ्य यह पूरी तरह से राजनीतिक उद्देश्य और प्रचार के लिए गढ़ा गया झूठा नरेटिव था, जिसका उद्देश्य प्रशासनिक सुधार और सामाजिक न्याय के लिए उठाए गए कदमों को बदनाम करना था।
