हनुमान भक्ति एक सामंती- पोंगापंथी गठजोड़ का परिणाम

✍️ मुद्रा राक्षस

हिंदू धर्म के अनेक संस्थानों पर जाति-विशेष का प्रभाव स्थापित है, जो धर्म की व्याख्या और धार्मिक संसाधनों का उपयोग अपने निजी लाभ, जातीय विशेषाधिकार और यथास्थितिवाद बनाए रखने के लिए करते हैं।

आधुनिक हनुमान भक्ति का प्रश्न स्वाभाविक धार्मिक विकास नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया है। आज हनुमान मंदिरों की संख्या, हनुमान चालीसा की लोकप्रियता और हनुमान पूजा के व्यापक प्रसार को अक्सर स्वाभाविक धार्मिक परंपरा माना जाता है।

परंतु यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे चुनावी राजनीति, पूंजीवादी व्यवस्था, जातीय विशेषाधिकार बनाए रखने की प्रवृत्ति जैसे कारक गहराई से जुड़े हुए हैं।

1906 में मुस्लिम लीग का गठन हुआ और 1909 के सुधारों द्वारा भारत में पृथक प्रतिनिधित्व लागू हुआ, जिसमें हिंदू और मुस्लिम वोट अलग-अलग पड़े।

मुस्लिम समुदाय अल्पसंख्यक होने के कारण सीटें कम प्राप्त करता था, इसलिए उन्होंने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया– मुसलमान कौन है, यह तो स्पष्ट है; पर हिंदू कौन है, इसका कोई सार्वभौमिक आधार नहीं है।

उनका तर्क था कि अनेक समुदाय ऐसे हैं जो प्रथाओं और मान्यताओं के अनुसार हिंदू नहीं हैं, परंतु जनगणना में हिंदू के रूप में वर्गीकृत किए जाते हैं, जिससे हिंदू जनसंख्या अस्वाभाविक रूप से अधिक दिखती है।

1911 की जनगणना, गेट सर्कुलर और हिंदू की पहचान के 10 आधार– इस राजनीतिक और सामाजिक तनाव के परिणामस्वरूप 1911 की दशकीय जनगणना से पहले एक निर्देश जारी हुआ, जिसे गेट सर्कुलर कहा गया। यह आज भी भारत सरकार की आधिकारिक जनगणना रिपोर्ट में उपलब्ध है। इसमें 10 आधार दिए गए थे जिनसे जनगणना अधिकारी यह तय करें कि कोई व्यक्ति या परिवार हिंदू समाज में वर्गीकृत होगा या नहीं।

इन 10 बिंदुओं में से चौथा प्रश्न था– क्या वह प्रमुख हिंदू देवताओं की पूजा नहीं करता? यदि नहीं करता तो उसे गैर-हिंदू के रूप में दर्ज किया जा सकता है।

1915–1925 के बीच हिंदू संगठनों का उदय और हनुमान को एक सर्वस्वीकार्य देवता के रूप में प्रस्तुत करना–

1915 में हिंदू महासभा और 1925 में RSS की स्थापना हुई। इन संगठनों के सम्मुख यह चुनौती थी कि यदि दलित, पिछड़े और शूद्र समुदायों को एक सर्वमान्य प्रमुख हिंदू देवता की आराधना का अवसर नहीं दिया गया, तो वे भविष्य में स्वयं को हिंदू धर्म से अलग मानने लगेंगे। इसी चिंता के चलते हनुमान को एक प्रमुख, सर्वसुलभ और सर्वमान्य देवता के रूप में स्थापित किया गया।

मजदूर-किसान वर्ग, साम्यवाद का उभार और हनुमान भक्ति का साधनात्मक प्रचार– 1920 के दशक में समाजवाद और साम्यवाद के विचार उभरने लगे। मजदूर-किसान वर्ग — जो मुख्यतः दलित, पिछड़ा या जनजातीय था —इन विचारों के प्रति संवेदनशील माना जाता था।इस परिदृश्य में हनुमान भक्ति का प्रयोग इस उद्देश्य से किया गया कि

यह वर्ग विद्रोही न बने। मालिक और सामंत के प्रति स्वामिभक्ति बनाए रखे। आज्ञाकारिता को धार्मिक आदर्श के रूप में स्वीकार करे

इसी कारण गाँव- कस्बों की गरीब बस्तियों में पेड़ों, चौराहों और सार्वजनिक स्थानों पर हनुमान मंदिर बड़े पैमाने पर स्थापित कर दिए गए।

1911 की जनगणना, भाषा-स्थिति और हनुमान चालीसा की वास्तविकता– 1911 की जनगणना के भाषा-सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि उस समय हिंदी भाषा आज जैसी विकसित नहीं थी। याद रहे, प्रेमचंद युग भी 1911 के बाद ही हिंदी साहित्य में आया।

ऐसे में यह मान लेना कि हनुमान चालीसा का व्यापक पाठ बहुत प्राचीन और सर्वव्यापी परंपरा है,तर्क पर खरा नहीं उतरता। उस समय अवधी भाषा की चालीसा उत्तर भारत में भी अधिकांश लोगों के लिए अनपढ़ता, स्थानीय बोलियों के प्रभाव।

प्रिंटिंग प्रेस और पुस्तकों की अल्पता के चलते पढ़ना और समझना कठिन था। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे क्षेत्रों में अवधी भाषा समझने वाले बेहद कम थे।

हनुमान भक्त किस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं क्या कभी आपने सोचा है कि सबसे उत्कट हनुमान भक्त किस जातीय और वर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं?

ऐतिहासिक रूप से 18वीं शताब्दी तक हनुमान कोई अत्यंत महत्वपूर्ण देवता नहीं थे। किसी भी संग्रहालय में आपको इस काल तक हनुमान की प्रमुख पूजा संस्कृति स्थापित नहीं मिलेगी।

हनुमान भक्ति को महत्व दिया उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ सामंत वर्गों ने —भक्ति के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि भक्त हनुमान का आदर्श वे अपने नौकर-चाकरों और सेवक जातियों पर स्थापित करना चाहते थे।

इसी उद्देश्य से उन्होंने गाँवों के किनारों, दलित और पिछड़ी बस्तियों के पास पत्थर गाड़ कर हनुमान शिलाएँ और मंदिर बनवाए। किसी शक्तिशाली सामंती परिवार का कुलदेवता हनुमान नहीं मिलता।

इन मंदिरों पर बैठाए गए पुजारी जाति-विशेष के लोग अपने सामंत-स्वामियों के लिए वही भूमिका निभाते थे जो मध्यकाल में चर्च राजा के लिए निभाता था।

लेखक का एक सुंदर अवलोकन है– अंग्रेजी में Lord का अर्थ ईश्वर भी है और सामंत भी। इसीलिए बाइबल का Lord हाउस ऑफ लॉर्ड्स पहुँच कर बहुवचन में भी बदल जाता है और मनुष्य भी बन जाता है।

हनुमान भक्ति एक सामंती-पोंगापंथी गठजोड़ का परिणाम है हनुमान भक्ति का प्रचार सामंत वर्ग और पुजारी वर्ग की कूट-संधि का परिणाम था। विष्णु मंदिर की तुलना में हनुमान मंदिर चलाना सस्ता था, इसलिए निर्धन और पिछड़े क्षेत्र हनुमान-भक्त बन गए और धनाढ्य क्षेत्र विष्णु-भक्त बने रहे।

वर्तमान समय की सबसे बड़ी मांग धार्मिक लोकतंत्रीकरण, इतिहास जो था सो था —पर वर्तमान में यह आवश्यक है कि मंदिर-पुजारी का पद सभी जातियों हेतु खुला रहे। कोई मंदिर परिवार-विशेष या जाति-विशेष की निजी जागीर न बने।धर्म तभी न्यायपूर्ण और जीवन्त रहेगा जब उसके संसाधन और उसके पद सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हों।

(लेखक एक निष्ठावान हिंदू है और किसी भी देवी-देवता या हिंदू धर्म का विरोध नहीं करता। लेखक के निजी विचार हैं)

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