✍️ मिथलेश कुमार सिंह
उत्तर भारत की समाजवादी राजनीति की पहचान लंबे समय तक सामाजिक न्याय, बराबरी और प्रतिनिधित्व के संघर्ष से जुड़ी रही है OBC, SC, ST और अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा और सत्ता-संरचना में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित करना इसका केंद्रीय लक्ष्य रहा है लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में यही सामाजिक न्याय हिंदुत्व की प्रभुत्वशाली राजनीति के दबाव में अपनी धार और दिशा खोता हुआ दिखाई दे रहा है!

हिंदुत्व की राजनीति ने लोकतांत्रिक बहस को योजनाबद्ध तरीके से धार्मिक पहचान, आस्था और भावनात्मक ध्रुवीकरण तक सीमित कर दिया है दुर्भाग्यवश, समाजवादी दल इस निर्धारित फ्रेम को तोड़ने के बजाय अक्सर उसी के भीतर प्रतिक्रिया करते नज़र आते हैं इसका सीधा परिणाम यह हुआ है कि जाति-आधारित शोषण, आरक्षण, शिक्षा, रोजगार, भूमि और संसाधनों के असमान बँटवारे जैसे मूलभूत प्रश्न राजनीतिक विमर्श के हाशिये पर चले गए हैं।

भाजपा आरएसएस के धार्मिक प्रतीकों की राजनीति का असर इटावा में केदारेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना और उसमें तमिलनाडु से आए पुजारियों की नियुक्ति को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है यह पहल एक ओर हिंदुत्व की राजनीति को चुनौती देने का प्रयास माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या समाजवादी राजनीति अब वैचारिक संघर्ष के बजाय प्रतीकों की प्रतिस्पर्धा में उलझती जा रही है?

तमिलनाडु में पेरियार की वैचारिक परंपरा के तहत मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की सरकार ने ब्राह्मणवादी एकाधिकार को तोड़ते हुए विभिन्न जातियों और महिलाओं को पुजारी नियुक्त करने की संस्थागत व्यवस्था विकसित किया इसके विपरीत, उत्तर भारत में अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि केदारेश्वर मंदिर में पुजारी और महंत की नियुक्ति खुली, पारदर्शी और समतावादी प्रक्रिया से होगी या यह पहल प्रतीकात्मक दायरे में ही सीमित रह जाएगी सामाजिक आधार से बढ़ती दूरी राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सवर्ण मतदाताओं को आकर्षित करने की रणनीति के तहत समाजवादी राजनीति धीरे-धीरे अपने सामाजिक न्याय के आधार से दूर होती जा रही है।
समाजवादी राजनीति की यह बहुत बड़ी कमजोरी रही है कि वह हिंदुत्व के एजेंडे को वैचारिक स्तर पर चुनौती देने के बजाय, कई बार अनजाने में उसे वैधता प्रदान करती दिखाई देती है सामाजिक न्याय, जो कभी सत्ता-संरचना को बदलने का औज़ार था, अब सत्ता बचाने या सत्ता प्राप्त करने की रणनीति तक सिमटता जा रहा है पेरियार ई.वी. रामासामी ने इसी प्रवृत्ति के खिलाफ असमानता पर आधारित धार्मिक-राजनीतिक संरचना के समानांतर एक समतावादी सामाजिक न्याय मॉडल प्रस्तुत किया उनका स्पष्ट मत है कि कट्टर और नफरती हिन्दुत्त्ववादी विचारधारा से मुकाबला केवल चुनावी राजनीति से संभव नहीं है इसके लिए सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक चारों मोर्चों पर एक साथ संघर्ष अनिवार्य है!
राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि उत्तर भारत में समाजवादी राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने वैचारिक आत्मविश्वास को पुनः स्थापित करना है सामाजिक न्याय को फिर से नीतिगत निर्णयों, जनसंघर्ष और वास्तविक प्रतिनिधित्व से जोड़ना होगा इसके साथ ही हिंदुत्व के तय किए गए राजनीतिक फ्रेम से बाहर निकलकर एक स्वतंत्र, मजबूत और बहुजन-केंद्रित विमर्श खड़ा करना होगा अन्यथा आशंका यही है कि समाजवादियों का सामाजिक न्याय हिन्दुत्त्व के फांस में उलझकर रह जाऐगा?
