✍️ मुद्रा राक्षस
15 अगस्त 1975 को जय संतोषी माता फिल्म के साथ ही एक नितांत काल्पनिक लेकिन दैवीय चरित्र संतोषी माता अवतरित हुई थी, ये एक दिन की घटना नहीं थी, 1960 के दशक के शुरु से ही हैंडबिल और पैंपलेट की एक बाढ़ इस चमत्कारी काल्पनिक देवी के बारे में गांव और शहर की स्त्रियों के बीच में कोई अज्ञात संस्था फैला रही थी।
आपने भी 1980 के दशक से 2000 के दशक तक इस प्रकार के पर्चे और फिर ईमेल देखे हैं जो आपको इस संदेश को आगे से आगे प्रसारित करने की चेतावनी धमकी और अनुग्रह एक साथ करते थे।
तो शिरडी का सांई बाबा काल्पनिक चरित्र तो नहीं था लेकिन उसका प्रभाव शिरडी और पूना तक सीमित था, जैसे ही एक नितांत काल्पनिक संतोषी माता पैदा हुई और मात्र एक फिल्म के माध्यम से इतना ज्यादा प्रचार इसने पा लिया, शिरडी अनुयायियों का एक समूह सक्रिय हो गया, इस समूह का लक्ष्य था हाल ही में नगर में आए वे लोग जो अपने मूल से कट रहे थे, अपने चरित्र में कोस्मोपोलीटिन थे और अपनी परंपरा से भली भांति परिचित नहीं थे, और क्योंकि ये हिंदू वर्ग था, जिनके पास कोई इमाम साहब नहीं थे, कोई बिशप नहीं था, कोई रबी नहीं था और न ही कोई ग्रंथी था, यदि कोई इनकी धार्मिक सेवा करता था तो वो थे दक्षिणा के लोभी पंडा पुजारी वर्ग जो किसी केंद्रीय संगठन में बंधा नहीं था, नितांत व्यक्तिगत रूप से कार्य करता था और जिसके पास कोई नवाचार नहीं था जो ये सदियों से करता आ रहा था वही अभी भी कर रहा था, जबकि भारत में उस समय अनेक नवीन मत पनप चुके थे जैसे ओशो रजनीश।
तो इसने मनमोहन देसाई जो उस समय अमर अकबर एंथनी बना रहा था को साधा, उन्हें अपनी नितांत मसाला फिल्म के लिए एक ऐसा प्रतीक चाहिए भी था जिसे नितांत हिंदू या मुस्लिम प्रतीक से न जोड़ा जा सके, अब शिव लिंग पे तो अकबर जल चढ़ाने से रहा और अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती नितांत मुस्लिम लगते थे इसलिए एक नया गंगा जमुनी तहजीब मॉडल बन कर सांई बाबा सिल्वर स्क्रीन पर अवतरित हुए, ठीक 27 मई 1977 को।
इसके बाद शिरडी साईं बाबा पे एक स्वतंत्र फिल्म बनी और एक स्थानीय संत हिंदू धर्म में एक नवीन देवता बन कर उभरा। प्रारंभ में सांई को हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक और दोनों समुदाय द्वारा पूजित बताया गया किंतु एकेश्वरवादी इस्लाम के अनुयायियों से छल करना कठिन था, दूसरे उसी समय अरब डॉलर से वहाबी इस्लाम भारत में सिर उठा रहा था इसलिए सांई बहुत जल्द बिस्मिल्लाह से ॐ सांई राम हो गया।
लेकिन 1977 से 1987 के एक दशक में साईं घर घर पहुंच गया और संतोषी माता पैदा होने के बाद किसी जगह धन वर्षा नहीं करवा सकी, सांई लोकप्रिय होते ही शिरडी में एक नवीन उद्योग स्थापित कर गए, क्या शिरडी में जो नए होटल बने, टैक्सी सेवा बढ़ी उसे तत्कालीन सरकार और जो कोई बुद्धिमान संगठन थे जैसे चर्च, सी आई ए, के जी बी, आर एस एस ने नहीं देखा?
क्या कोई नहीं था जो बहुत जल्दी धर्म और राजनीति का घाल मेल शुरू कर के सत्ता प्राप्ति की और बढ़ता और इसके लिए सिनेमा मीडिया को आधार बनाता?
(क्रमशः)
