✍️ मुद्रा राक्षस
पूर्व में फिल्म से अवतरित हुई संतोषी माता का प्रभाव कैसे धर्म में स्वीकार्य हो गया था और कैसे अमर अकबर एंथनी की कव्वाली से साई बाबा का प्रचार हुआ था ये बताया जा चुका है। इसी श्रृंखला में तीसरा लेख –
भारत एक विशाल राष्ट्र है और भाषाई विभाजन के चलते आम आदमी तो बेचारा एक कोने से दूसरे कोने ना तो जा पाता है और यदि चला भी जाए तो भाषा भेद के चलते उसको दूसरे इलाके की संस्कृति एवं समाज को समझने में पूरा जीवन निकल जाता है।
हां जो सत्ता के निकट अभिजात वर्ग है उसने प्राचीन काल से ही एक व्यवस्था आपस में संवाद की बना ली थी जो पहले संस्कृत फिर फारसी और आज अंग्रेजी भाषा है, इसके चलते ये आपस में संवाद और सहयोग कर लेते हैं और आम आदमी को मातृभाषा का पाठ रटा के कोल्हू में बैल की तरह पेर के रखते हैं।
तो जब वर्तमान तेलंगाना और आंध्र प्रदेश एक हुआ करते थे तब सिनेमा का एक नायक था एन. टी. रामाराव जिसने 1950 के दशक से ही फिल्मों के पर्दे पर बार बार भगवान शिव, विष्णु, कृष्ण की भूमिका निभाई, ये 17 फिल्मों में कृष्ण बन गए थे।
इनका सीमावर्ती राज्य था तमिलनाडु जो की 1953 तक तो इनके राज्य में ही शामिल था , और एक बड़ी तेलगु भाषी आबादी मद्रास नगर में रहती थीं और है।
श्री रामा राव ने अपनी आंखों से द्रविड पार्टी का उदय देखा था और ये भी वो देख चुके थे कि फिल्मों मे बना गरीबों का मसीहा एम जी आर कैसे आसानी से सत्ता प्राप्त कर लेता है।
फिर इनकी भी तो छवि रुपहले पर्दे पर भगवान की थी वैसे 1970 से ये भी सावधानी से और पूर्व योजना के अंतर्गत गरीबों के मसीहा की भूमिका करने लगे थे।
उसी समय अत्यधिक केंद्रीयकृत कांग्रेस पार्टी जो 1980 का लोकसभा चुनाव जीत कर फिर से घमंडी हो गई थी ने कुछ ऐसे कृत्य कर दिए थे जिनसे आंध्र प्रदेश की जनता में रोष फैल गया था और वो इसे तेलगु सभ्यता के अपमान की तरह देख रही थी, इसी का लाभ श्री रामा राव ने तेलगू देशम पार्टी का गठन करके उठाने की सोची, तेलगु जनता ये भी समझती थी कि बगल का तमिलनाडु पूरी तरह से कांग्रेस मुक्त था और इसके मामलों में दिल्ली से कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता था क्योंकि सत्ता तो द्रविड पार्टी के पास ही रहनी थी।
जबकि आंध्रप्रदेश में 1982 तक पिछले 6 वर्षों में 5 मुख्यमंत्री दिल्ली से बन कर आ और जा चुके थे।
बस इन्ही परिस्थितियों का लाभ उठा कर रामाराव ने जुआ खेलने का निर्णय लिया और अपने पर्दे पे उभरी भगवान वाली छवि को भुना लिया।
इस प्रकार मात्र 9 महीने में उनकी पार्टी आंध्रप्रदेश में सत्ता में आ गई। इस घटना को भी भारत के अभिजात वर्ग ने ध्यान से देखा, खास तौर पर जो सत्ता से वंचित नेता थे उन्होंने इसे सत्ता प्राप्ति हेतु सुगम मार्ग मान लिया, अब बस उन्हें तलाश थी एक मौके की जब वे धर्म और राजनीति को घाल मेल करके सत्ता प्राप्त कर ले। (जारी)
