✍️ मुद्रा राक्षस
संतोषी माता एक पहेली!,शिरडी साईं बाबा संतोषी माता का बेटा था!, रुपहले पर्दे के भगवान की सत्ता प्राप्ति! श्रृंखला का चौथा लेख अतीत के गलियारों से नाम से प्रस्तुत किया जा रहा है।
यह भारतीय इतिहास के उस कालखंड पर टिप्प्णी है जिसे 40 साल बीतने के बाद भी अभी तक समझने का कोई प्रयास नहीं किया गया है।
यह घटना 23 अप्रैल 1985 को शाहबानो केस फैसले से शुरू हुई थी, अपरिपक्व राजीव गांधी को दबाव में लाना कठिन काम नही था , पंजाब जल रहा था, जून 1985 में कनिष्क विमान बम से उड़ा दिया गया था, सैकड़ों समस्याएं थी ऐसे में विवाद को बढ़ने से रोकने के लिए राम जन्म भूमि के कुछ ताले खोल के समर्थन पाने की सलाह स्लीपर सेल ने प्लांट करवा दी और बिना ज्यादा दूर तक सोचे हुए ये हो गया।
इसी समय स्लीपर सेल ने रामानंद सागर से संपर्क साधा और उसे रामायण टीवी सीरीज बनाने की सलाह दी और आश्वाशन दिया कि स्लीपर सेल से फंडिंग भी होगी और सीरीज टीवी पर उपलब्ध एकमात्र चैनल पर आ भी जाएगा ।
उधर दूर संचार विभाग ,सूचना और प्रसारण मंत्रालय में स्लीपर सेल ने प्लांट करवा के रामायण सीरीज हाल ही में शुरू हुए दूरदर्शन जो रंगीन प्रसारण शुरू ही किया था से अनुमति प्राप्त कर ली , 1982 में एन .टी. रामाराव जो जिंदगी भर स्क्रीन पे भगवान बने थे के मुख्यमंत्री बनने और 1984 में सबसे बड़ा विपक्ष दल बना रहने से ये स्पष्ट था कि धर्म को मीडिया पर दिखा कर राजनैतिक सत्ता प्राप्त की जा सकती है।
तो बस 1987 में रामायण का टीवी स्क्रीन पर अवतरण हुआ , पहले से तैयार बैठे बाजार ने इसे फंड किया और ये अपार लोकप्रिय हो गया ।
इसी दौरान 1989 के चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो एजेंडा आगे बढ़ाने का अवसर मिला और जब नई सरकार ठीक से चल भी नहीं रही थी तो कार सेवा और ,रथ यात्रा शुरू कर के एजेंडा आगे ले जाया गया।
इसी दौरान हाशिम पुरा मेरठ इत्यादि के प्रयोग भी स्लीपर सेल ने कर लिए थे । बस यही वो काल खंड है जिसपे कोई बात नहीं करता है ।
लेकिन जो देखने वाले थे वो जान गए कि धर्म के नाम पे पैसा भी खूब कमाया जा सकता है, शिरडी नगर का जिस तरह से विस्तार हुआ उसे देख समझ के बड़े ही नियोजित ढंग से अयोध्या के सर्किल रेट बढ़ने नहीं दिए गए और भारत भर से पैसा लगा के अयोध्या में लगाया गया, उज्जैन में लगाया गया , काशी में लगाया गया और नवीन धार्मिक केंद्र खाटू श्याम जी जिसका नाम 100 साल पुराने किसी रिकॉर्ड में नहीं मिलता है और बागेश्वर धाम जो अभी 2019 तक अज्ञात था में आज जिस तरह से एक नई अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है वो इसी अतीत के अनदेखे भाग जिस पर कोई चर्चा नहीं की जाती , में बनी योजनाओं का परिणाम है।
(लेखक एक आस्थावान हिंदू है लेकिन धर्म के बाजारीकरण से त्रस्त भी है , धर्म राजनीति और बाजार के इस गठजोड़ पर ध्यान देने के बाद ही चार लघु आलेखों की ये श्रृंखला लिखी गई है।)
