✍️ डॉ संजीव कुमार
छत्तीसगढ़ में आने से पहले मैंने सतनामी के बारे में कहीं सुना ही नहीं था. मुझे इस विचारधारा और इसके इतिहास के विषय में भी कोई जानकारी नहीं थी. कुछ साल यहां बिताने के बाद धीरे-धीरे मुझे इसकी संस्कृति और इतिहास के बारे में जानने का अवसर मिला. अपने साथ कार्यरत सहयोगी और मित्रों से जब मैंने इस विषय में जानकारी हासिल की तो उन्होंने बताया कि यहां सतनामी परंपरा बहुत ही बृहद और विशाल परंपरा में से एक है. छत्तीसगढ़ में यहां के सतनामी समाज के वगैर राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक विकास की भूमिका नहीं लिखी जा सकती.
इस विषय में जब मैंने और गहराई से अध्ययन किया तो ज्ञात हुआ कि इस समाज में यहां की पिछड़ी जातियों सहित अनुसूचित जाति तथा जनजाति समाज का बहुत बड़ा हिस्सा इसकी संस्कृति और परंपरा का वाहक है.
इस परंपरा के जनक महान संत और समाज सुधारक गुरु घासीदास जी ने मध्य भारत को जमींदारी प्रथा, छुआछूत,डोली प्रथा, पशु बलि एवं धार्मिक भेदभाव से दूर रखने के लिए 1757 ईस्वी में अपनी कविताओं, लोकगीतों और पारंपरिक जनमाध्यमों से समाज को जागृत करने का कार्य किया.
समाज के रूढ़िवादी और छुआछूत सहित अनेक भेदभाव के दलदल से समाज को बाहर निकलने में जिस प्रकार गुरु गोविंद सिंह ने पश्चिमी भारत, संत रविदास ने पूर्वी भारत, नंदनार चोखा मेला और पेरीयार ने दक्षिण भारत को जागृत करने का कार्य क्या उसी प्रकार मध्य भारत को छुआछूत,अंधविश्वास, और जमींदारी प्रथा से बचाने का कार्य गुरु घासीदास ने किया था.
तब छत्तीसगढ़ (मध्य प्रदेश) मध्य भारत का बहुत बड़ा हिस्सा माना जाता था. सतनामी समाज कबीरपंथी समाज के बाद दूसरा ऐसा सामाजिक पंथ है जिसमें देशभर के सभी जाति के लोग विश्वास रखते हैं. गुरु घासीदास की विचारधारा ने सभी जातियों को अपनी तरफ आकर्षित करने का कार्य किया था. इस पंथ के में लगभग सभी जातियों के लोग आपको मिल जाएंगे.
उनकी मृत्यु के पश्चात उनके प्रथम पुत्र गुरु बालकदास (1805) जी ने अपने पिता और बाबा गुरु घासीदास जी द्वारा सामाजिक जागरूकता के अभियान को रूकने नहीं दिया बल्कि उसे और तीव्र गति से समूचे प्रदेश भर में स्थापित करने का कार्य किया. उन्होंने गुरु घासीदास के विचारों को समाज तक पहुंचाने के साथ-साथ समाज के आर्थिक विकास हेतु फिर जागरूक करने का कार्य किया.गुरु बालकदास के बढ़ते प्रभाव के कारण दूसरे समुदाय, और सामंती प्रथा के लोगों ने उन पर कई बार जानलेवा हमला किया. इस बात को ध्यान में रखते हुए गुरु बालक दास ने पंथ के सभी लोगों को शारीरिक रूप से सक्षम होने के साथ – साथ उन्हें उन्हें शस्त्रों का भी ज्ञान रखना आवश्यक बताया था. इस विषय में डॉ नरेश कुमार साहू कहते हैं कि ” उनके शारीरिक क्षमता एवं शस्त्र ज्ञान के आह्वान पर सभी सतनामी बंधुओ ने, कुश्ती, मल युद्ध,के साथ साथ अपने घरों में शस्त्र रखना भी अनिवार्य कर दिया. यही कारण है कि आज सतनामी समाज से संबंधित किसी भी पर्व पर इस समाज द्वारा शस्त्रों की पूजा, प्रदर्शन की जाती है और उनके अनुयायियों द्वारा विभिन्न प्रकार के कर्तव दिखाए जाते हैं. आज छत्तीसगढ़ के बहुसंख्यक दलित लोग इस संप्रदाय का हिस्सा हैं. और जब कभी भी उनके ऊपर किसी जाति विद्वेष के कारण कोई दूसरा समाज हमला करता है तो यह पूरा समाज एकत्र होकर के उसका प्रतिकार करता है. इनकी एकता के कारण आज तक दूसरा समाज इन पर कभी उस प्रकार हावी नहीं हो पाया जिस प्रकार से पूर्वी भारत में दलितों पर अन्य जातियां हावी हो जाती है. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश बिहार जैसे अन्य राज्यों की अपेक्षा यहां दलितों पर अत्याचार के मामले बहुत कम है.
पंजाब के उन दलितों को तो गुरु गोविंद साहब ने सिंह बनाकर उन्हें सामाजिक सहभागिता में सक्षम तो बना दिया पर जो लोग इस क्रांति से दूर रहे वह आज भी वहां शोषित हो रहे हैं. उत्तर प्रदेश और बिहार में आज भी एक ऐसी विचारधारा की जरूरत है जो यहां के दलितों को आत्म बल प्रदान कर सके. यहां के लोग धार्मिक रूप से या तो बुद्ध के उपासक हैं या फिर रविदास के परन्तु दोनों अंततः हिन्दू धर्म के इर्द – गिर्द ही रहते हैं और शोषण का शिकार होते रहते है.
कालांतर में ऐसी जातियां, समुदाय और धर्म जिन्होंने ईश्वर आराधना के साथ-साथ अर्थ, और शस्त्र को भी अपना प्रतिक समझा वह समाज भविष्य में भी आत्म बल के साथ जी रहा हैं. सिख समुदाय ने हिंदू धर्म से अलग होने के बाद खड़ग रखना अनिवार्य समझा, मुस्लिम समाज हमेशा से शस्त्रों की पूजा करती आ रही है, हिंदू धर्म में क्षत्रिय समाज राजपूत समाज आज भी शस्त्र पूजा एवं प्रदर्शन का विधान रखता आया हैं. ब्राह्मण समाज परशुराम के नाम पर शस्त्र धारण करके तो कहीं शिवसेना,बजरंग बल बनाकर समाज में दबदबा बनाए हुए हैं. परंतु भारत की पिछड़ी और दलित जातियां आज भी बिना शस्त्रों के आध्यात्मिक तलाश में अपना आत्म बल और स्वाभिमान लगातार खोता आ रहा हैं.
इसलिए बेहतर होगा कि भारत का अपेक्षित दलित और पिछड़ा समाज भी अपना कोई ऐसा गुरु घासीदास ढूंढ ले जो उसे आत्म बल के साथ-साथ उसका स्वाभिमान भी लौट सके.
