✍️ मिथलेश कुमार सिंह
छत्तीसगढ़ की सामाजिक चेतना के इतिहास में बाबा संत गुरु घासीदास जी केवल एक संत नहीं, बल्कि शोषण, अपमान और अमानवीय परंपराओं के विरुद्ध खड़े होने वाले क्रांतिकारी सामाजिक सुधारक के रूप में दर्ज हैं उन्होंने जिस युग में जन्म लिया, उस समय जाति आधारित भेदभाव अपने चरम पर था और तथाकथित ऊँची जातियों द्वारा निम्न कही जाने वाली जातियों पर अमानवीय प्रथाएँ थोप दी गई थीं इन्हीं में से एक थी ‘डोली प्रथा’।
ऐतिहासिक व सामाजिक अध्ययन बताते हैं कि मध्य भारत (विशेषकर वर्तमान छत्तीसगढ़, पूर्वी मध्य प्रदेश व उड़ीसा के कुछ क्षेत्रों) में प्रचलित डोली प्रथा के अंतर्गत विवाह के बाद शूद्र-अछूत समाज की नवविवाहिता को ‘अशुद्ध’ बताकर उसे “शुद्ध” करने के नाम पर गाँव के ऊँची जाति के व्यक्ति/पुरोहित/ज़मींदार के यहाँ भेजा जाता था कई स्थानों पर यह प्रक्रिया निजी कक्ष (डोली/झोपड़ी/कोठरी) में होती थी, जहाँ स्त्री की मर्यादा, इच्छा और सहमति का कोई मूल्य नहीं होता था सामाजिक दबाव के कारण परिवार विरोध नहीं कर पाता था यह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सत्ता और जाति आधारित था! यह प्रथा केवल श्रम शोषण नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा को कुचलने की एक संगठित व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य एक पूरे समाज को मानसिक गुलामी में जकड़े रखना था।
बाबा गुरु घासीदास जी ने इस अमानवीय व्यवस्था को ईश्वर की इच्छा मानने से साफ इनकार कर दिया उन्होंने स्पष्ट कहा “मनखे-मनखे एक समान” अर्थात हर मनुष्य समान है, न कोई ऊँचा है, न कोई नीचा उन्होंने डोली प्रथा को अधर्म, अन्याय और मानवता के विरुद्ध अपराध घोषित किया और अपने अनुयायियों से इसका बहिष्कार करने का आह्वान किया। गुरु घासीदास जी के नेतृत्व में सतनाम पंथ ने यह संकल्प लिया कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे मनुष्य को जन्म के आधार पर ढोने या उसकी गुलामी स्वीकार करने को बाध्य नहीं होगा।
सतनाम पंथ केवल आध्यात्मिक मार्ग नहीं था, बल्कि यह एक सामाजिक मुक्ति आंदोलन था। इसने डोली प्रथा जैसी कुप्रथाओं को चुनौती दी, जातिगत श्रेष्ठता की अवधारणा को खारिज किया और श्रम, सम्मान व समानता को जीवन का मूल मूल्य घोषित किया।
आज जब संविधान समानता और गरिमा का अधिकार देता है, तब भी सामाजिक भेदभाव के नए-नए रूप सामने आते हैं। ऐसे समय में गुरु घासीदास जी का संदेश हमें याद दिलाता है कि समानता केवल कानून से नहीं, सामाजिक चेतना से आती है
