एक न भूलने वाली कहानी — एक मनोवैज्ञानिक रूपक 

✍️ मुद्रा राक्षस

भाग 1

मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि स्टोर रूम में एक “बंदूक” छुपी है, और यदि मैं उसे ढूँढ लूँ, तो वह मेरी हो सकती है — मैं उसका उपयोग अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए कर सकता हूँ।

पर मैं एक साधारण परिवार में पला-बढ़ा था। मैंने कभी बंदूक देखी भी नहीं थी, सुनी भी नहीं थी।

इसलिए मैंने तुरंत उत्तर दिया — “मुझे मूर्ख मत बनाओ, इस दुनिया में बंदूक नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं।”

भाग 2

मगर मेरा मित्र आत्मविश्वास से भरा था। उसने कहा कि उसने वह बंदूक देखी है और अक्सर उसका उपयोग करता है। उसने कहा —

“अगर तुम उसे पकड़ लो तो सारे लोग तुम्हारे आगे झुकेंगे और तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरी करेंगे।”

अब मेरे भीतर जिज्ञासा जागी। मैंने निर्णय लिया कि मुझे वह बंदूक खोजनी है।

मैं स्टोर रूम में गया — जो पुराने डब्बों, कागज़ों और कचरे से भरा हुआ था। तीन घंटे की मेहनत के बाद भी कोई बंदूक नहीं मिली।

भाग 3

मैं मित्र के पास वापस गया। उसने पूछा —

“क्या तुमने विशेष चश्मे पहने थे? उस बंदूक को देखने के लिए एक विशेष लेंस वाला चश्मा ज़रूरी होता है।”

मैंने तुरंत उससे चश्मा खरीदा और दोबारा खोज शुरू की। मगर फिर भी कुछ नहीं मिला। थका-हारा, निराश होकर मैं वापस आया और बोला —

“कुछ नहीं मिला, विशेष चश्मा पहनने के बाद भी।”

भाग 4

अब मित्र ने कहा —

“अगर स्टोर रूम में नहीं मिली तो गैराज में खोजो। असली और बड़ी बंदूकें वहीं छुपाई जाती हैं।”

मैं उत्साहित हो गया, लेकिन फिर उसने कहा —

“इस बार मेटल डिटेक्टर भी ले जाना, जिससे ढूँढना आसान हो जाएगा।”

मैंने धन्यवाद दिया और मेटल डिटेक्टर भी उसी से खरीद लिया।

गैराज में घंटों तलाश करने के बाद मुझे केवल एक प्लास्टिक की वाटर गन मिली। मैं उसे लेकर मित्र के पास पहुँचा।

उसने देखा और कहा —

“अरे! तुम्हारे मेटल डिटेक्टर की बैटरी खत्म हो चुकी है, इसीलिए तुम असली बंदूक नहीं ढूँढ पाए।”

भाग 5

यह सिलसिला चलता रहा — रोज़ एक नई उम्मीद, एक नया उपकरण, एक नया स्थान। हफ्ते बीत गए, लेकिन बंदूक नहीं मिली।

मैं अंदर से टूटने लगा। मैंने सोचा —

“शायद मैं ही अयोग्य हूँ। शायद मैं ही इस बंदूक को खोजने के काबिल नहीं हूँ।”

भाग 6

आख़िरकार मैंने खोज छोड़ दी।

अब मैं अक्सर गैराज में अकेला बैठा रहता। सोचता —

“अगर मैंने ये समय किसी रचनात्मक कार्य में लगाया होता, तो शायद मैं आगे बढ़ चुका होता।”

एक दिन मैंने अपने मित्र के बग़ीचे की ओर देखा — रंग-बिरंगे फूल, नई कारें…

वहीं मेरी बग़ीचा सूखा पड़ा था। क्योंकि मैं तो पिछले एक महीने से बंदूक खोजने में ही व्यस्त था।

भाग 7

मैंने देखा — मित्र अपने बग़ीचे को सींच रहा था, और पानी की पाइप मेरे बग़ीचे के नल से जुड़ी थी।

मुझे याद आया — म्युनिसिपल कमिटी ने उसके बग़ीचे में पानी की लाइन नहीं डाली थी।

पहले तो मुझे लगा — “चलो, किसी की मदद तो हो रही है।”

लेकिन तभी मेरे मन में प्रश्न उठे

* मेरे यहाँ पानी का उपयोग ही नहीं हुआ, फिर भी बिल ज़्यादा कैसे आया?

• उसके बग़ीचे में इतनी तरक्की एक महीने में कैसे हो गई?

• मैंने तो चश्मा, डिटेक्टर, बैटरियाँ खरीदने में पैसे उड़ा दिए और वो दो नई गाड़ियाँ ले आया?

अब मुझे समझ आया कि असली खेल क्या था।

मैंने मित्र से पूछा —

“क्या तुम्हारे पास पहले से ही बंदूक है?”

उसने जवाब दिया —

“हां, है… मगर वो मेरी निजी चीज़ है। अगर तुम्हें अपनी चाहिए, तो खुद खोजो।”

अब सवाल जो मेरे मन में उठे

भाग 1:

“क्या बिना प्रमाण के किसी चीज़ के अस्तित्व को नकार देना सही था?”

क्योंकि मैंने बिना देखे ही मान लिया कि बंदूक जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं।

भाग 2:

“फिर मैं उसी मित्र की बातों पर कैसे विश्वास कर बैठा?”

“क्यों मैंने अपनी सोच और विश्वास पर भरोसा नहीं किया?”

“क्यों नहीं मैंने पहले प्रमाण माँगे?”

भाग 3:

“जब मैं जानता था कि कुछ नहीं मिलेगा, तो फिर क्यों बार-बार महंगे उपकरण खरीदता रहा?”

“क्या यह मेरी भूल थी?”

भाग 4:

“जब स्थान बदला गया, तब क्यों मैंने सच को स्वीकार नहीं किया और समय पर नहीं रुका?”

भाग 5:

“क्या मुझे पहले ही समझ नहीं जाना चाहिए था कि यह एक भ्रम है?”

“क्यों मैं तब भी रुका नहीं?”

भाग 6:

“क्यों कई लोग खुद को दोष देते हैं और सोचते हैं कि वे अयोग्य हैं?”

“क्या यह आत्मदया नहीं है?”

भाग 7

“कितने लोग असली खेल को समझ भी नहीं पाते और सारा जीवन भ्रम में गुजार देते हैं?”

अब जब आप पाठक (यानि आप) इस कहानी को पढ़ चुके हैं…

क्या आपके पास इन सवालों के उत्तर हैं?

अगर हां, तो इन रूपकों के अर्थ पढ़ें।

रूपक-व्याख्या (Metaphor decoding):

– बंदूक – ईश्वर या मोक्ष का विचार

– स्टोर रूप –एक विशेष धर्म या पंथ

– गैराज–दूसरा धर्म या मत

– मित्र–धार्मिक नेता / सत्ता तंत्र / स्वघोषित गुरु

– (कथावाचक)–आम आदमी

– विशेष चश्मा व मेटल डिटेक्टर–झूठे रीति-रिवाज, कर्मकांड

– प्लास्टिक गन– चमत्कारिक झांसे या धोखा

– बग़ीचा और कारें –धार्मिक ठेकेदारों की संपन्नता

– पानी की पाइप–आम जनता से संसाधनों का दोहन

निष्कर्ष (Moral):

इस कहानी में यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण नहीं है कि “बंदूक” (या ईश्वर) वास्तव में है या नहीं।

महत्त्वपूर्ण यह है कि कैसे एक सरल मन को भुलावे में रखकर उसके संसाधन, समय, और ऊर्जा को दूसरों के फायदे के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

धर्म, सत्ता और समाज — इनका सबसे बड़ा हथियार है आम जनता की मानसिकता और उसकी इच्छाओं का नियंत्रण।

इस खेल से बचने का एकमात्र उपाय है —

“न्यायिक सोच (Critical Reasoning)”।

आप सोचें, आप सवाल करें, आप समझें —

क्योंकि आपका मन ही असली हथियार है — कोई ‘बंदूक’ नहीं।

(अस्वीकृति (Disclaimer): इस कहानी में प्रयुक्त रूपक पूर्णतः काल्पनिक हैं और किसी व्यक्ति, समुदाय या धर्म की भावना को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं लिखे गए हैं।)

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