✍️ मिथलेश कुमार सिंह
भारत मनुस्मृति से नहीं, संविधान से चलता है यह कोई वैदिक मठ, ब्राह्मणवादी दरबार या धार्मिक अखाड़ा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक गणराज्य है फिर भी उत्तर प्रदेश में एक कथावाचक पुंडरीक गोस्वामी को पुलिस परेड और गार्ड ऑफ ऑनर देना इस सच्चाई का खुला अपमान है यह महज़ प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि संविधान के विरुद्ध मनुस्मृति की वापसी का प्रतीकात्मक ऐलान है!
मनुस्मृति में राजा का धर्म था ब्राह्मणों को विशेष सम्मान देना, उन्हें राज्यसत्ता से ऊपर बैठाना और शूद्र-बहुजन समाज को अनुशासन के नाम पर अधीन रखना आज वही मानसिकता रामराज्य के वेश में लौट रही है, जहाँ कथावाचक को वह सम्मान दिया जा रहा है जो संविधान ने केवल राष्ट्र, शहीदों और संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए तय किया है पुलिस की सलामी कानून के राज की नहीं, वर्णवादी आस्था की सेवा में खड़ी कर दी गई।
गार्ड ऑफ ऑनर राज्य की संप्रभु शक्ति का प्रतीक है यह संविधान के प्रति निष्ठा का सार्वजनिक प्रदर्शन होता है किसी जाति-आधारित धार्मिक पदानुक्रम को वैध ठहराने का औज़ार नहीं जब एक कथावाचक को यह सम्मान मिलता है, तो संदेश साफ़ है संविधान नहीं, मनुस्मृति सर्वोच्च है!
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के तथाकथित “रामराज्य” में अब हालात यह हैं कि धर्म क़ानून से ऊपर, आस्था संविधान से ऊपर और कथावाचक लोकतांत्रिक संस्थाओं से ऊपर बैठाए जा रहे हैं। यह रामराज्य नहीं यह मनुवादी राज है, जहाँ राज्य की पुलिस सत्ता की नहीं, वर्ण-धर्म की रखवाली करती दिखती है।
डॉ. आंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाया था क्योंकि वह समानता, न्याय और मानव गरिमा की दुश्मन थी आज उसे जुलूस, सलामी और सरकारी वैधता के ज़रिये ज़िंदा किया जा रहा है। सवाल सिर्फ़ एक कथावाचक का नहीं है सवाल यह है कि भारत संविधान से चलेगा या मनुस्मृति से? और अगर सत्ता का जवाब दूसरा है, तो यह लोकतंत्र पर नहीं, बल्कि बहुजन समाज पर खुला युद्ध है!
